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क्‍या भय्यू महाराज के जीवन में वाकई आ गया था डाउनफॉल!

इंदौर। भय्यू महाराज के सूर्योदय आश्रम के बोर्ड पर मंगलवार को लिखी संतवाणी उनके जीवन में चल रहे उतार-चढ़ाव को बयां कर रही थी। कुछ समय से वाकई उनके जीवन में डाउनफॉल आ गया था और अकसर वे बातों ही बातों में इसे बयां भी कर देते थे।

आश्रम के भारी-भरकम खर्च, पारिवारिक क्लेश और कम होती साख ने उनके आसपास नैराश्य का ऐसा जाल बुन रखा था कि वे चाहकर भी उससे उबर नहीं पाए। कुछ दिनों से उनकी मनोदशा को भांपकर सेवादार भी उन्हें कम ही अकेला छोड़ते थे।

कम होने लगी थी भक्तों की संख्या

दूसरा विवाह करने का भय्यू महाराज का फैसला उनके ज्यादातर भक्तों को नहीं भाया। किसी ने सामने तो नाराजगी जाहिर नहीं की, लेकिन धीरे-धीरे आश्रम की गतिविधियों में भक्तों की संख्या का ग्राफ गिरने लगा था। आश्रम में पहले जो बड़े आयोजन होते थे, वे छोटे कार्यक्रमों में सीमित होने लगे थे। खुद भय्यू महाराज को इस बात का अहसास होने लगा था।

पहली पत्नी की मौत के बाद बड़ी बेटी के लिए भी महाराज ज्यादा चिंतित रहते थे। वह पढ़ाई के लिए पुणे में रहती थी। महाराज को अकसर लगता था कि मां की मौत के बाद बेटी खुद को अकेला महसूस कर रही है और दूसरे विवाह के बाद वे पारिवारिक सामंजस्य ठीक से बैठा नहीं पा रहे हैं।

 

एक समय भय्यू महाराज से मिलने के लिए वीवीआईपी भक्त कतार में लगे रहते थे, लेकिन कई ऐसे थे जो महाराज के संबंधों को भुनाकर अपने काम निकलवाने आते थे। बड़े भक्तों से दान में कमी होने से आश्रम की आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगी थी।

महाराष्ट्र के कोल्हारपुर के आयोजन में सार्वजनिक जीवन से संन्यास लेने की बात के बाद उन्होंने खुद अपनी स्थिति बयां की थी और कहा था कि चार महीने से वे आश्रम के लोगों को वेतन नहीं दे पा रहे हैं। लोग उनके पास मतलब से आते हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया था कि वे कोई ब्रोकर नहीं है कि कमीशन लेकर काम करें।

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