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कांग्रेस से कटने लगे माया-अखिलेश, त्रिकोणीय मुकाबले का गवाह बनेगा उत्तर प्रदेश!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान 'यूपी के लड़के' सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मिलकर चुनाव लड़े थे लेकिन नतीजा पक्ष में नहीं आया. बीजेपी ने भारी बहुमत के साथ सूबे की सत्ता हासिल की. एक साल बाद हाथी-साइकिल की जोड़ी गोरखपुर और फूलपुर में साथ आई तो बीजेपी के गढ़ में सपा-बसपा ने परचम लहरा दिया. यानी यूपी का राजनीतिक संकेत साफ है सपा-बसपा का साथ पसंद है लेकिन कांग्रेस उतनी असरदार नहीं है. इसी संकेत को अब अखिलेश यादव और मायावती समझने लगे हैं और दोनों नेताओं ने राहुल गांधी के नेतृत्व वाली देश की मुख्य विपक्षी पार्टी से कन्नी काटना शुरू कर दिया है.

सूत्रों का कहना है कि अखिलेश यादव यूपी चुनाव में पार्टी की दुर्गति के लिए कांग्रेस के साथ को ही जिम्मेदार मानते हैं. साथ ही उनका मानना है कि कांग्रेस को रायबरेली और अमेठी के अलावा कोई और सीट नहीं दी जा सकती. बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस इन्हीं दो पारंपरिक सीटों पर चुनाव जीत पाई थी. उस दौरान 'सपा परिवार' ने 5 सीटें जीती थीं जबकि बसपा का तो सूपड़ा-साफ हो गया था. अगर कांग्रेस के साथ सपा-बसपा का गठबंधन हुआ तो इन दोनों दलों को पंजे के लिए कई सीटें छोड़नी पड़ेंगी, जो कि इन दोनों में से कोई दल नहीं चाहता.

सीटों पर समझौते के मूड में नहीं बसपा

बसपा प्रमुख मायावती पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि वे गठबंधन होने के बावजूद सीटों को लेकर कई समझौता करने के मूड में नहीं हैं. 80 सीटों वाले यूपी में मायावती 40 सीटों पर अपनी स्वाभाविक दावेदारी मानकर चल रही हैं. गठबंधन के लिए समझौते की मेज पर बैठने के समय हो सकता है कि वे कुछ नरमी लाकर चार-पांच सीटें छोड़ भी दें लेकिन इसके कम तो बसपा को कतई मंजूर नहीं होगा. ऐसे में कांग्रेस के लिए छोड़ी जाने वाली सीटें कहां से आएंगी.

अखिलेश कुर्बानी को तैयार, मगर कितनी?

अखिलेश यादव सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वो बड़ा दिल दिखाएंगे और गठबंधन के लिए जरूरी हुआ तो कुछ सीटें छोड़ भी देंगे लेकिन ये ‘कुछ’ कितना होगा ये साफ नहीं है. ऐसे समय में जब केंद्र में गैर बीजेपी-गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बनने के भी कुछ आसार हों, कोई भी क्षेत्रीय दल एक सीमा से ज्यादा नहीं झुकेगा. अखिलेश की सपा भी इससे अलग नहीं है. इसके अलावा नूरपुर में जिस तरह से सपा और बसपा ने आरएलडी के लिए मैदान खाली कर दिया, उससे आरएलडी भी इस गठबंधन में जुड़ने और कुछ सीटों पर दावा ठोंकने को तैयार बैठी है. सीटों के इस तरह बंटवारे में कांग्रेस के लिए कुछेक सीटें ही बचती हैं जिनपर पार्टी मानेगी ऐसा लगता नहीं है.

माना जा रहा है कि सीटों की इसी कशमकश को भांपते हुए अखिलेश यादव और मायावती अब कांग्रेस पर दबाव बनाने में जुट गए हैं. दोनों दल नहीं चाहते कि कांग्रेस को इतना भाव दिया जाए कि वो गठबंधन में अपने लिए ज्यादा सीटों की मांग कर सके. यही वजह है कि दोनों नेताओं ने राहुल गांधी को झटका देना आरंभ कर दिया है.

मायावती ने पकड़ ली अलग राह

मायावती ने कांग्रेस के गठबंधन के मंसूबों पर पानी फेरते हुए मध्यप्रदेश में अलग से चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है. ये तब हुआ जब कांग्रेस के नेता लगातार बीएसपी के साथ गठबंधन को लेकर बयान दे रहे थे और सिर्फ एमपी नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी हाथी की सवारी की तैयारी में थे. बीते माह हुए कर्नाटक चुनाव में भी वह नतीजों से पूर्व कांग्रेस के विरोधी दल जेडीएस के साथ मिलकर चुनावी समर में उतरी थीं. बसपा ने राज्य में न सिर्फ एक सीट जीती बल्कि यूपी से बाहर पहली बार कांग्रेस-जेडीएस सरकार में बसपा विधायक को मंत्री का पद भी दिया गया.

अखिलेश ने भी बंद कर ली मुट्ठी

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के करीबी सूत्रों के मुताबिक पार्टी साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें ही देना चाहती है. इस बाबत गठबंधन के दूसरे दलों से चर्चा करने के लिए मंगलवार को अखिलेश यादव दिल्ली पहुंच रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी सिर्फ अमेठी और रायबरेली सीट ही कांग्रेस को देना चाहती है. सपा इससे एक भी सीट ज्यादा कांग्रेस को नहीं देना चाहती है. इस बाबत सपा कांग्रेस को प्रस्ताव भी देने की योजना बना रही है. सपा के सूत्रों का कहना है कि पार्टी यूपी में त्रिकोणीय मुकाबला चाहती है और महागठबंधन में कांग्रेस को शामिल करने की इच्छुक नहीं है.

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