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शादी से 7 साल में हुआ हो Murder तो चलेगा दहेज हत्या का मुकदमा

बिलासपुर। हाईकोर्ट ने माना है कि दहेज हत्या के मामले में विवाह के सात वर्ष के अंदर मौत होने की बात साबित करना जरूरी है। इसके साथ ही आरोपितों को दोषमुक्त करने के खिलाफ शासन की अपील को खारिज कर दिया है।

कबीरधाम कवर्धा जिले के कुंडा थाना क्षेत्र के ग्राम डबरी निवासी संतोष कुमार चंद्राकर पिता चमरू राम का मुंगेली क्षेत्र निवासी सरोज बाई से बाल विवाह हुआ था। 20 जून 1998 को सरोज ने आत्महत्या कर ली। मृतक की मां झाड़िन बाई व पिता उम्मेद राम ने रिपोर्ट लिखाई।

इसमें कहा गया कि ससुराल में पति संतोष कुमार, ससुर चमरू राम व सास पांचोबाई द्वारा दहेज की मांग कर सरोज से मारपीट व प्रताड़ित किया जा रहा था। ससुराल वालों द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर उसने आत्महत्या की है। पुलिस ने तीनों के खिलाफ धारा 498 ए, दहेज हत्या के तहत 304 बी एवं 306, 34 के तहत अपराध पंजीबद्धकर न्यायालय में चालान पेश किया।

मामले की मुंगेली के सत्र न्यायालय में सुनवाई हुई। गवाह मृतक के पिता उम्मेद राम व मां झाड़िन बाई ने कहा कि उनकी बेटी का छह-सात साल की उम्र में संतोष के साथ विवाह हुआ था। इसके पांच-दह साल बाद गौना हुआ। मृत्यु के समय मृतक की उम्र 25 वर्ष थी। दोनों विवाह की तिथि बताने में असमर्थ रहे। मुंगेली के विचारण न्यायालय ने विवाह की उम्र, गौना के समय और मृत्यु के समय मृतक की आयु की गणना करने पर पाया कि शादी को 10 वर्ष से अधिक हो गया था।

विवाह के सात वर्ष के अंदर मृत्यु नहीं होने पर अदालत ने सभी को दहेज हत्या के आरोप से दोषमुक्त किया। इसी प्रकार दहेज मांगे जाने व प्रताड़ित करना सिद्ध नहीं होने पर 498 ए एवं 306 से भी दोषमुक्त किया गया। सत्र न्यायालय के आदेश के खिलाफ शासन ने हाईकोर्ट में अपील की।

इस पर जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली डीबी में सुनवाई हुई। डीबी ने माना कि भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी तथा साक्ष्य अधिनियम की धारा 113 ख के अनुसार विवाह के सात वर्ष के अंदर मृत्यु साबित करना जरूरी है। यह अभियोजन की जिम्मेदारी है। साक्ष्य के अभाव में सत्र न्यायालय के आदेश को यथावत रखते हुए शासन की अपील को खारिज कर दिया है।

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