शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ 2017: आज से आपके घर आà¤à¤‚गे पितर
ॠआगचà¥à¤›à¤¨à¥à¤¤à¥ मे पितर à¤à¤µà¤‚ गà¥à¤°à¤¹à¤¨à¥à¤¤à¥ जलानà¥à¤œà¤²à¤¿à¤®'
हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि गà¥à¤°à¤¹à¤£ कीजिà¤à¥¤
आज से पितर हमारे घर में वास करेंगे। शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ यानी पितृ पकà¥à¤· का पहला शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ बà¥à¤§à¤µà¤¾à¤° को पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ के साथ पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤®à¥à¤ हो रहे हैं। इस बार à¤à¥€ सोलह के सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर पनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹ दिन के ही शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ हैं। पिछले साल à¤à¥€ पनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹ ही शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤ थे। सोलह शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ 2020 में पड़ेंगे। पनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹ दिन के लिठहमारे पितृ घर में होंगे और तरà¥à¤ªà¤£ के माधà¥à¤¯à¤® से तृपà¥à¤¤ होंगे। यह अवसर अपने कà¥à¤², अपनी परंपरा, पूरà¥à¤µà¤œà¥‹à¤‚ के शà¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ कारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ का सà¥à¤®à¤°à¤£ करने और उनके पदचिहà¥à¤¨à¥‹à¤‚ पर चलने का संकलà¥à¤ª लेने का है।
शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ कà¥à¤¯à¤¾ है
वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ का अपने पितरों के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾ के साथ अरà¥à¤ªà¤¿à¤¤ किया गया तरà¥à¤ªà¤£ अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समरà¥à¤ªà¤¿à¤¤ किया गया à¤à¥‹à¤œà¤¨ यही शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ कहलाता है। देव, ऋषि और पितृ ऋण के निवारण के लिठशà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करà¥à¤® है। अपने पूरà¥à¤µà¤œà¥‹à¤‚ का सà¥à¤®à¤°à¤£ करने और उनके मारà¥à¤— पर चलने और सà¥à¤–-शांति की कामना ही वसà¥à¤¤à¥à¤¤: शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करà¥à¤® है।
कब होता है पितृ पकà¥à¤·
à¤à¤¾à¤¦à¥à¤° पकà¥à¤· की पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ से पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤®à¥à¤ होकर शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ पकà¥à¤· आशà¥à¤µà¤¿à¤¨ मास की अमावसà¥à¤¯à¤¾ तक होता है। पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ का शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ उनका होता है, जिनकी मृतà¥à¤¯à¥ वरà¥à¤· की किसी पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ को हà¥à¤ˆ हो। वैसे, जà¥à¤žà¤¾à¤¤, अजà¥à¤žà¤¾à¤¤ सà¤à¥€ का शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ आशà¥à¤µà¤¿à¤¨ अमावसà¥à¤¯à¤¾ को किया जाता है।
यूं होते हैं सोलह दिन के शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§
पंडित केदार मà¥à¤°à¤¾à¤°à¥€ और शà¥à¤°à¥€ हरि जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿à¤· संसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿à¤°à¥à¤µà¤¿à¤¦ पंडित सà¥à¤°à¥‡à¤‚दà¥à¤° शरà¥à¤®à¤¾ कहते हैं कि सूरà¥à¤¯ अपनी पà¥à¤°à¤¥à¤® राशि से à¤à¥à¤°à¤®à¤£ कर कनà¥à¤¯à¤¾ राशि में à¤à¤• माह के लिठà¤à¥à¤°à¤®à¤£ करते हैं। तà¤à¥€ यह सोलह दिन का पितृपकà¥à¤· मनाया जाता है। इन सोलह दिनों के लिठपितृ आतà¥à¤®à¤¾ को सूरà¥à¤¯ देव पृथà¥à¤µà¥€ पर अपने परिजनों के पास à¤à¥‡à¤œà¤¤à¥‡ हैं। पितृ अपनी तिथि को अपने वंशजों के घर जाते हैं। पकà¥à¤· पनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹ दिन का ही होता है लेकिन जिनका निधन पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ को हà¥à¤† है, उनका à¤à¥€ तरà¥à¤ªà¤£ होना चाहिà¤à¥¤ इसलिठपूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ को à¤à¥€ इसमें शामिल कर लिया जाता है और शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ 16 दिन के होते हैं।
मृतà¥à¤¯à¥ के à¤à¤• साल तक होता है पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•à¥à¤·à¤¾ काल
मृतà¥à¤¯à¥ से à¤à¤• साल की अवधि पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•à¥à¤·à¤¾ काल होती है। जब किसी का देहावसान होता है तो हमको पता नहीं होता कि वह किस योनि में गया है या उनको मोकà¥à¤· मिला या नहीं। शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के मà¥à¤¤à¤¾à¤¬à¤¿à¤• कà¤à¥€-कà¤à¥€ पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•à¥à¤·à¤¾ काल लंबा à¤à¥€ हो जाता है। आमतौर पर मृतà¥à¤¯à¥ के à¤à¤• साल की अवधि ( बरसी) तक हम मोकà¥à¤· की कामना करते हà¥à¤ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करà¥à¤® करते हैं। इस à¤à¤• साल के बाद हमारे पितृ देवताओं की शà¥à¤°à¥‡à¤£à¥€ में आ जाते हैं। शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ पकà¥à¤· वसà¥à¤¤à¥à¤¤: अपने पितरों को जल, तिल और कà¥à¤¶ के माधà¥à¤¯à¤® से आहार पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ करना है।
जल और तिल ही कà¥à¤¯à¥‹à¤‚
शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ पकà¥à¤· में जल और तिल ( देवानà¥à¤¨) दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ तरà¥à¤ªà¤£ किया जाता है। जो जनà¥à¤® से लय( मोकà¥à¤·) तक साथ दे, वही जल है। तिलों को देवानà¥à¤¨ कहा गया है। à¤à¤¸à¤¾ माना जाता है कि इससे ही पितरों को तृपà¥à¤¤à¤¿ होती है।
तीन पीढ़ियों तक का ही शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§
शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ केवल तीन पीढ़ियों तक का ही होता है। धरà¥à¤®à¤¶à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के मà¥à¤¤à¤¾à¤¬à¤¿à¤• सूरà¥à¤¯ के कनà¥à¤¯à¤¾ राशि में आने पर परलोक से पितृ अपने सà¥à¤µà¤œà¤¨à¥‹à¤‚ के पास आ जाते हैं। देवतà¥à¤²à¥à¤¯ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में तीन पीढ़ी के पूरà¥à¤µà¤œ गिने जाते हैं। पिता को वसॠके समान, रà¥à¤¦à¥à¤° दादा के समान और परदादा आदितà¥à¤¯ के समान माने गठहैं। इसके पीछे à¤à¤• कारण यह à¤à¥€ है कि मनà¥à¤·à¥à¤¯ की सà¥à¤®à¤°à¤£ शकà¥à¤¤à¤¿ केवल तीन पीढ़ियों तक ही सीमित रहती है।
कौन कर सकता है तरà¥à¤ªà¤£
पà¥à¤¤à¥à¤°, पौतà¥à¤°, à¤à¤¤à¥€à¤œà¤¾, à¤à¤¾à¤‚जा कोई à¤à¥€ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ कर सकता है। जिनके घर में कोई पà¥à¤°à¥à¤· सदसà¥à¤¯ नहीं है लेकिन पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ के कà¥à¤² में हैं तो धेवता और दामाद à¤à¥€ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ कर सकते हैं। यह à¤à¥€ कहा गया है कि किसी पंडित दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ à¤à¥€ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ कराया जा सकता है।
महिलाà¤à¤‚ à¤à¥€ कर सकती हैं शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§
महिलाà¤à¤‚ à¤à¥€ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ कर सकती हैं बशरà¥à¤¤à¥‡ घर में कोई पà¥à¤°à¥à¤· सदसà¥à¤¯ नहीं हो। लेकिन नवीन मानà¥à¤¯à¤¤à¤¾à¤“ं के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° अपने पितृ और मातृ तà¥à¤²à¥à¤¯ लोगों का शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ महिलाà¤à¤‚ कर सकती हैं। यदि घर में कोई बेटा नहीं है तो पà¥à¤¤à¥à¤°à¤µà¤¤ किसी के à¤à¥€ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ महिलाà¤à¤‚ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करा सकती हैं।
कौआ, कà¥à¤¤à¥à¤¤à¤¾ और गाय
इनको यम का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• माना गया है। गाय को वैतरिणी पार करने वाली कहा गया है। कौआ à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯à¤µà¤•à¥à¤¤à¤¾ और कà¥à¤¤à¥à¤¤à¥‡ को अनिषà¥à¤Ÿ का संकेतक कहा गया है।इसलिà¤, शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ में इनको à¤à¥€ à¤à¥‹à¤œà¤¨ दिया जाता है। पंडित आशà¥à¤¤à¥‹à¤· तà¥à¤°à¤¿à¤µà¥‡à¤¦à¥€ कहते हैं कि चूंकि हमको पता नहीं होता कि मृतà¥à¤¯à¥ के बाद हमारे पितृ किस योनि में गà¤, इसलिठपà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•ातà¥à¤®à¤• रूप से गाय, कà¥à¤¤à¥à¤¤à¥‡ और कौआ को à¤à¥‹à¤œà¤¨ कराया जाता है।
कैसे करें शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§
पहले यम के पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• कौआ, कà¥à¤¤à¥à¤¤à¥‡ और गाय का अंश निकालें ( इसमें à¤à¥‹à¤œà¤¨ की समसà¥à¤¤ सामगà¥à¤°à¥€ में से कà¥à¤› अंश डालें)
- फिर किसी पातà¥à¤° में दूध, जल, तिल और पà¥à¤·à¥à¤ª लें। कà¥à¤¶ और काले तिलों के साथ तीन बार तरà¥à¤ªà¤£ करें। ऊं पितृदेवताà¤à¥à¤¯à¥‹ नम: पढ़ते रहें।
-वसà¥à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤¦à¤¿ जो à¤à¥€ आप चाहें पितरों के निमित निकाल कर दान कर सकते हैं।
यदि ये सब न कर सकें तो
-दूरदराज में रहने वाले, सामगà¥à¤°à¥€ उपलबà¥à¤§ नहीं होने, तरà¥à¤ªà¤£ की वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ नहीं हो पाने पर à¤à¤• सरल उपाय के माधà¥à¤¯à¤® से पितरों को तृपà¥à¤¤ किया जा सकता है। दकà¥à¤·à¤¿à¤£ दिशा की ओर मà¥à¤‚ह करके खड़े हो जाइà¤à¥¤ अपने दाà¤à¤‚ हाथ के अंगूठे को पृथà¥à¤µà¥€ की ओर करिà¤à¥¤ 11 बार पढ़ें..ऊं पितृदेवताà¤à¥à¤¯à¥‹ नम:। लेकिन इनको पितृ अमावसà¥à¤¯à¤¾ के दिन अवशà¥à¤¯ तरà¥à¤ªà¤£ करना चाहिà¤à¥¤
पितृ अमावसà¥à¤¯à¤¾
जिनकी मृतà¥à¤¯à¥ तिथि याद नहीं रहती या किनà¥à¤¹à¥€ कारण से हम शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ नहीं कर पाते, à¤à¤¸à¥‡ जà¥à¤žà¤¾à¤¤-अजà¥à¤žà¤¾à¤¤ सà¤à¥€ लोगों का शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ पितृ अमावसà¥à¤¯à¤¾ को किया जा सकता है। इस दिन शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करà¥à¤® अवशà¥à¤¯ करना चाहिà¤à¥¤ इसके बाद ही पितृ हमसे विदा लेते हैं।
कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ नहीं होते शà¥à¤ करà¥à¤®
यह सोलह या 15 दिन शोक के होते हैं। अपने पितरों को याद करने के होते हैं। इसलिà¤,इन दिनों मांगलिक कारà¥à¤¯, गृह पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶, देव सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ के कारà¥à¤¯ वरà¥à¤œà¤¿à¤¤ हैं।
-जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿à¤°à¥à¤µà¤¿à¤¦ पंडित सà¥à¤°à¥‡à¤¦à¥à¤° शरà¥à¤®à¤¾
सीता जी ने à¤à¥€ किया था शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§
जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿à¤·à¤¾à¤šà¤¾à¤°à¥à¤¯ वीके सकà¥à¤¸à¥‡à¤¨à¤¾ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° महिलाओं का शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करना निषेध नहीं है। à¤à¤—वान राम गया जी में अपने पूरà¥à¤µà¤œà¥‹à¤‚ का शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करने गà¤à¥¤ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करने में देरी हो गई। तà¤à¥€ राजा दशरथ ने दोनों हाथ फैलाकर कहा कि मेरा तरà¥à¤ªà¤£ कब होगा। सीता जी उस वकà¥à¤¤ वहां थी। सीता जी ने कहा कि वह आपका शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ महिला होने के नाते कैसे कर सकती हैं? राजा दशरथ ने कहा कि महिलाà¤à¤‚ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ कर सकती हैं। मिटà¥à¤Ÿà¥€ उठाओ और मेरा पिंडदान करो। इससे साबित होता है कि महिलाà¤à¤‚ शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ कर सकती हैं। सकà¥à¤¸à¥‡à¤¨à¤¾ ने कहा कि शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ अपने संसाधनों से करना चाहिà¤à¥¤ इसको बोठनहीं बनाना चाहिà¤à¥¤ न ही उधार लेकर शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करना चाहिà¤à¥¤
शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§: टूट रही हैं वरà¥à¤œà¤¨à¤¾à¤à¤‚
मà¥à¤°à¤¾à¤¦à¤¾à¤¬à¤¾à¤¦à¥¤ पितृ पकà¥à¤· को लेकर अब वरà¥à¤œà¤¨à¤¾à¤à¤‚ à¤à¥€ टूट रही हैं। पहले यह माना जाता था कि यह करà¥à¤®à¤•ांड केवल पà¥à¤°à¥à¤·à¥‹à¤‚ तक ही सीमित है। पà¥à¤°à¥à¤· ही इस कारà¥à¤¯ को कर सकते हैं।महिलाओंं को शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करà¥à¤® करने की छूट नहीं थी। ठीक इसी पà¥à¤°à¤•ार जैसे दाह संसà¥à¤•ार करना महिलाओं के लिठवरà¥à¤œà¤¿à¤¤ था।
हाल फिलहाल में महिलाà¤à¤‚ या बेटियां आगे बढ़कर अपने पिता और पति का दाह संसà¥à¤•ार करती हैं। यही नहीं, शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ करà¥à¤®à¤•ांड à¤à¥€ करने लगी हैंं। यह महिला सशकà¥à¤¤à¤¿à¤•रण का ही à¤à¤• पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है। अब पंडितोंं ने à¤à¥€ इनके लिठà¤à¥€ रासà¥à¤¤à¥‡ खोल दिठहैं।
नर से नारायण सेवा
शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ में पंडितों को à¤à¥‹à¤œà¤¨ कराने की परंपरा है। इसमें à¤à¥€ सदियों से चली आ रही परिपाटी टूट रही है। लोग पंडितोंं के सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर गरीब और असहाय लोगों को à¤à¥‹à¤œà¤¨ कराते हैं। अनाथालय जाते हैं और वहां पितरों के नाम पर किताबें, वसà¥à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤¦à¤¿ देते हैं। शà¥à¤°à¤¾à¤¦à¥à¤§ में पितरों को उऩकी पà¥à¤°à¤¿à¤¯ चीजें दान देने की परपंरा है। अब ये पà¥à¤°à¤¿à¤¯ चीजेंं समाज के उपेकà¥à¤·à¤¿à¤¤ वरà¥à¤— को दी जाने लगी हैं ताकि इनका सदà¥à¤ªà¤¯à¥‹à¤— हो सके।