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कांग्रेस क्यों नहीं बदल पा रही अपने पुराने 'नोट'?

राहुल गांधी अपने चार हज़ार के नोट बदलवाने एटीएम पहुंच गए। करीब घंटेभर तक लाइन में खड़े रहे। सेल्फी राजनीति की और नोट बदलवाकर लौट आए। इसके बाद समाचार चैनलों की प्राइम टाइम में चिपकने का उनका मकसद एक और दिन के लिए पूरा हो गया। पीके खुश हुआ और बाबा प्रसन्‍न। पांच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को बंद करने के फैसले पर सवाल खड़े करने में राहुल गांधी सफ़ल हुए, मगर अफसोस कांग्रेस के पुराने पड़ चुके और चलन से बाहर होते नोटों को वो बदलवा नहीं पाए।

इस पूरे मामले पर अपनी बात आगे बढ़ाने से पहले इस लेख के शीर्षक की असली भावना को साफ कर देना ज़रूरी है। दरअसल, यहां कांग्रेस के पुराने नोट से सीधा मतलब उसकी छवि से है। देश में उसकी इमेज भ्रष्टाचार को पालने वाली पार्टी की बनी हुई है। यकीं नहीं आए तो एक सर्वे करा लीजिए, अब भले ही कांग्रेसी ये पढ़कर बिदक जाएं, मगर वो भी जानते हैं कि इस देश में नेताओं की जो भ्रष्टाचारी छवि बनी है, उसके पीछे कांग्रेस के बीते 49 साल के शासन का अपना ही हाथ है।

राजनीतिक पंडित कितना ही गणित लगा लें, लेकिन जानने वाले जानते हैं कि राजनीति चमकाने के लिए की गई राहुल गांधी की इस एटीएम यात्रा ने कांग्रेस की भ्रष्टाचारी  छवि को और चमका दिया है। नोट बदल लिए, लेकिन इमेज बदलने की अक्ल इस पार्टी को आज तक नहीं आई।

आइए जरा अतीत में चलते हैं। नेहरू और इंदिरा के बाद राजीव गांधी के दौर से ही कांग्रेस पार्टी की छवि भ्रष्टाचार करने वाली पार्टी की बनने लगी थी। कांग्रेस के बाग़ी वीपी सिंह का इसमें बड़ा योगदान रहा। बोफोर्स तोपों की डील में राजीव गांधी और सोनिया के मित्रों ने कोई दलाली खाई इस बात के पक्के प्रमाण कभी नहीं मिले, बावजूद इसके कांग्रेस पार्टी की छवि भ्रष्टाचार करने वाली पार्टी की क्यों बनीं रही? शायद प्रशांत किशोर ने भी कभी इस बारे नहीं सोचा, सोचते तो इस छवि को सुधारने या यूं कहें कि कांग्रेस के पुराने पड़ चुके नोट को बदलवाने की कोशिश करते, ना कि राहुल गांधी को एटीएम भेजकर चार हज़ार रुपये बदलवाते।

कांग्रेस की भ्रष्टाचार वाली छवि बदल सकती थी। बोफोर्स पर लोग यकीन नहीं करते, अगर कॉमनवेल्थ, टूजी, थ्री जी और दामाद जी जैसे प्रकरणों में कांग्रेस नहीं फंसती। अब भी एक मौका था कि पांच सौ और हज़ार के नोटों को बंद करने के मोदी सरकार के फैसले के साथ कांग्रेस मज़बूती से खड़ी होती,लेकिन कांग्रेस पहले दिन से ही कंफ्यूजन में है।

दरअसल, दूरदर्शिता इसी को कहते हैं। यूपी चुनावों में 25-50 सीटें जीतने से कांग्रेस की करंसी नहीं चलने वाली (अगर जीते भी तो)। पीके एंड पार्टी को समझना होगा कि अब बाज़ार में नई करंसी चल रही है। राहुल अपने चार हज़ार रुपये बदलवाने की जगह कांग्रेस पार्टी की इस पुरानी और सड़ी गली करंसी को बदलवाएं, तो उनका और पार्टी दोनों का भविष्य बदलेगा। कांग्रेस के खाटीं, दिग्‍गज और बेहद अनुभवी नेताओं को समझना चाहिए कि पीके का क्या है, कंसल्टंट कभी ज़िम्मेदारी नहीं लेते, उनका काम तो बस ज्ञान देना होता है।

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