पीतांबरा पीठ में पूर्ण आहुति हुई संपन्न:दस हज़ार साधक हुए शामिल, 1962 में शुरू हुआ था आयोजन जो अब भी जारी
नवरात्र में 9 दिनों तक देवी मां की भक्ति में लीन भक्तों को 2 साल बाद श्री पीतांबरा पीठ पर सामूहिक हवन में शामिल होने का मौका मिला है। रविवार सुबह 7 बजे से पीठ पर स्थित दोनों यज्ञशाला में हवन शुरू किया गया। दोपहर 2 बजे तक क्रम से हवन चला।
लगभग दस हज़ार साधकों ने पीठ पर अपनी साधना की शांति के लिए पीठ पर पूर्व दी। दोपहर 12 बजे से कन्या भोज व सामूहिक भंडारे का आयोजन किया गया। पूर्णाहुति में पीतांबरा पीठ ट्रस्ट की अध्यक्ष एवं राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया भी शामिल हुई।
मार्च 2020 के बाद कोरोना काल होने के कारण पीतांबरा पीठ पर साधना करने वालों के साथ-साथ भंडारे पर भी रोक लगा दी गई थी। अब ठीक 2 साल बाद भक्तों को पीठ पर अपनी साधना की शांति के लिए पूर्ण आहुति देने का अवसर मिला है। पीठ पर साधना करने वालों के साथ अपने घरों पर साधना करने वाले साधकों को पीठ पर ही 25 रुपए के कूपन के साथ में हवन सामग्री दी गई।
सन्1962 में जब भारत और चीन का युद्ध हुआ था। तब मां पीतांबरा के स्वामी जी ने फौजी अधिकारियों व तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के अनुरोध पर देश की रक्षा के लिए मां बगलामुखी का 51 कुंडीय महायज्ञ कराया था। ऐसा बताया जाता है कि 11वें दिन अंतिम आहुति के साथ ही चीन ने अपनी सेनाएं वापस बुला ली थी। उस समय यज्ञ के लिए बनाई गई यज्ञशाला आज भी दतिया में बनी हुई है। इसी के साथ 1962 से राष्ट्र की रक्षा के लिए साल में दो बार हवन का आयोजन किया जाता है जिसमें पीतांबरा पीठ के साधक शामिल होते हैं।
दतिया जिले में स्थित मां पीतांबरा को राजसत्ता की देवी माना जाता है। भक्त भी इसी रूप में उनकी आराधना करते हैं। राजसत्ता की कामना रखने वाले भक्त यहां आकर गुप्त पूजा अर्चना करते हैं। मां पीतांबरा शत्रु नाश की अधिष्ठात्री देवी हैं और राजसत्ता प्राप्ति में मां की पूजा का विशेष महत्व होता है। मां की मूर्ति में भी माता को शत्रु की जिव्हा पकड़े दिखाया है। इनकी पूजा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है। शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि भगवान परशुराम ने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए मां की उपासना की थी।