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भारत को दुनिया में मजबूत करेगा यूएन में हुआ ये बड़ा बदलाव, लगेगा चीन को झटका?

पिछले दिनों पुर्तगाल के पूर्व प्रधानमंत्री एंटोनियो गुटेरेस ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के नये महासचिव के रूप में शपथ ली। उन्हें यूएन महासभा के अध्यक्ष जॉन विलियम्स द्वारा ये शपथ दिलाई गई और अब वे आगामी एक जनवरी को अपना पदभार संभाल लेंगे। वे पिछले दस वर्षों से संयुक्त राष्ट्र महासचिव के रूप में कार्यरत बान की मून की जगह लेंगे। वे यूएन के नौवें महासचिव बने हैं। बान की मून 13 अक्टूबर, 2006 को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बने थे और तबसे अब तक वे इस पद पर हैं। ये उनके पांच वर्षों का दूसरा कार्यकाल है, जो कि 31 दिसंबर को पूरा हो जाएगा।
बहरहाल, बान की मून के जाने और एंटोनियो के आने से ये उम्मीद जगी है कि संयुक्त राष्ट्र के ढांचे और कार्यपद्धति में बदलाव आएगा। शपथ ग्रहण के समय दिए अपने वक्तव्य में उन्होंने इस तरह की बातों के संकेत भी दिए हैं। गुटेरेस ने अपने शपथ ग्रहण के बाद संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों को संबोधित करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र संगठन बहुपक्षीयता में अहम है और इसने दशकों की सापेक्षिक शांति में योगदान दिया है, लेकिन चुनौतियां उनसे निपटने की हमारी क्षमता से आगे निकल रही हैं, ऐसे में संयुक्त राष्ट्र को बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र को फुर्तीला, कार्यकुशल एवं प्रभावी होने की जरूरत है, उसे प्रक्रिया पर कम, सेवाओं की आपूर्ति पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, नौकरशाही पर कम और लोगों पर अधिक बल देना चाहिए। गुटेरेस की इन बातों का सार तत्व यही है कि उनका प्राथमिक लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र में हर स्तर पर बदलाव लाना होगा, संभव है कि इसमें सांगठनिक बदलाव भी सम्‍मिलित होगा। उसकी कार्यपद्धति को लचीला बनाने पर भी उनका जोर होगा।
गौर करें तो गुटेरेस की तमाम बातें वही हैं, जिन्‍हें भारत अक्सर कहता रहा है। भारत की तरफ से भी अक्सर यूएन सुधार संबंधी इसी तरह बातें की जाती रही हैं। वर्ष 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से इस तरह की बातें और भी मुखर रूप से कही जाने लगी हैं।
उल्लेखनीय है कि गत् वर्ष संयुक्त राष्ट्र के अपने संबोधन में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार पर जोर देते हुए कहा था, ‘सुरक्षा परिषद समेत संयुक्त राष्ट्र में सुधार अनिवार्य है ताकि इसकी विश्वसनीयता और औचित्य बना रहे सके। साथ ही, हम ऐसे विश्व का निर्माण कर सकें जहां प्रत्येक जीव मात्र सुरक्षित महसूस कर सकें, सभी को अवसर और सम्मान मिले।‘ पीएम के इस वक्तव्य में स्पष्ट है कि भारत यूएन में सुधार पर जोर देता रहा है और अब यूएन के नये महासचिव गुटेरेस भी उसमें सुधार लाने की बात कर रहे हैं, तो ये भारत की मांग को बल देने वाला सिद्ध हो सकता है।
दरअसल, यह तो समय की आवश्यकता है कि संयुक्त राष्ट्र का सांगठनिक विस्तार किया जाए और इसकी कार्यपद्धति में लचीलापन लाया जाए। संयुक्त राष्ट्र का वर्तमान स्‍वरूप कितना संकुचित और अड़ियल है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत जैसे वैश्विक पटल पर मजबूती से अपनी छाप छोड़ रहे देश को यूएन की सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता नहीं मिल पा रही, जबकि परिषद् के पांच में से चार स्थायी सदस्य देश भारत की सदस्यता के पक्षधर हैं, मगर, सिर्फ एक चीन इसमें बिना किसी वास्तविक वजह के बस भारत से अपनी व्यक्तिगत खुन्नस के कारण वीटो का रोड़ा लगा देता है और बात अटक जाती है। इस अड़ियल व्यवस्था को लचीला किए जाने की आवश्यकता है, जिससे और देशों को भी उसमें अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का अवसर मिल सके। संभव है गुटेरेस के आने से चीन के इस रवैये पर लगाम लगेगी।
इधर, भारत के अलावा जापान, ब्राजील, जर्मनी इत्यादि तमाम देश हैं, जो संयुक्त राष्ट्र किस स्थायी सदस्यता की अहर्ता रखते हैं, उन्हें इससे वंचित रखना संयुक्त राष्ट्र के एक वैश्विक और निष्पक्ष निकाय के रूप स्थापित अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाएगा और संभव है कि तब ये देश उसकी अवहेलना की नीति अपनाना भी शुरू कर दें। वैसे भी, सिर्फ पांच देश मिलकर दुनिया की सुरक्षात्मक नीतियां निर्धारित कैसे कर सकते हैं? अतः अगर संयुक्त राष्ट्र को अपनी प्रासंगिकता और महत्व को बरकरार रखना है, तो सभी योग्य राष्ट्रों को उसमें समान रूप से भागीदारी मिलनी ही चाहिए।
बान की मून काफी लंबे समय तक यूएन के महासचिव रहे, लेकिन इन सब बिन्दुओं पर वे या तो सिर्फ शिकायतें सुनते रहे या कोरा आश्वासन देते रहे। कदम उठाने में उन्होंने कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। अब एंटोनियो गुटेरेस द्वारा सुधार की बात करने के बाद उम्मीद तो जगी है कि इन बिन्दुओं पर कुछ बात बढ़ेगी, लेकिन जब तक वे कुछ ठोस कदम न उठाएं तब तक कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। देखना होगा कि वे यूएन में सुधार संबंध अपनी बातों पर किस तरह से बढ़ते हैं और क्या कदम उठाते हैं? हालांकि भारत जैसे देशों को उनके पदभार सभालने के बाद यूएन में सुधार की अपनी मांग को और पूर जोर ढंग से उठाकर उन पर दबाव बनाए रखना चाहिए।

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