Homeदेश विदेश,प्रमुख खबरे,slider news,
हल्के मंत्रीपद के बाद भी एनडीए में खटपट क्यों नहीं, सहयोगी दलों से क्या तय हुआ फॉर्मूला?

लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकेले दम पर पूर्ण बहुमत न मिलने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की थी कि मोदी एनडीए गठबंधन की सरकार कैसे चला पाएंगे? इंडिया गठबंधन के नेता भी मान रहे थे कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं को साथ में लेकर चलना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं रहेगा। इन नेताओं का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी कुछ इसी तरह का संकेत दे रहा था। माना जा रहा था कि समर्थन के बदले ये सहयोगी दल मोदी पर जबरदस्त दबाव बनाएंगे और बड़े-बड़े अहम विभाग अपने हिस्से में करने में कामयाब रहेंगे। इंडिया गठबंधन तो इस संभावित टकराव में ही अपने लिए 'सत्ता की संभावनाएं' भी तलाशने लगा था।

 

लेकिन राजनीतिक पंडितों की ये कयासबाजी पूरी तरह फुस्स साबित हुई है। नरेंद्र मोदी ने विभागों के बंटवारे में सीसीएस की सबसे महत्त्वपूर्ण चार मंत्रालयों (गृह, रक्षा, वित्त और विदेश मंत्रालय) के साथ-साथ कृषि, सड़क परिवहन, ऊर्जा, शहरी विकास और शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग भी अपने ही पास रखे हैं। एनडीए के सहयोगी दलों को अपेक्षाकृत काफी कमजोर विभाग सौंपे गए हैं। लेकिन इसके बाद भी एनडीए में कहीं से कोई आपसी गतिरोध दिखाई नहीं दिया। 

रोचक बात है कि टीडीपी की कथित बड़ी दावेदारी के बाद भी चंद्रबाबू नायडू नाराज नहीं हुए, उलटे मोदी के साथ उनके रिश्ते ज्यादा मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। मोदी नायडू के शपथ ग्रहण में जाकर इस रिश्ते को और मजबूत बनाने का संकेत भी दे रहे हैं। शिवसेना-एनसीपी गुट ने हल्का-फुल्का विरोध अवश्य जताया है, लेकिन उनके स्वर में भी 'बाद में बेहतर समायोजन' होने की संभावना ही जताई गई हैं। 

अब प्रश्न यही किया जा रहा है कि मोदी ने यह 'करिश्मा' कैसे किया? जो राजनीतिक दल अपनी मांगों से लगातार केंद्र की सरकारों को परेशान करते रहे थे, वे इतने कमजोर मंत्रालय मिलने के बाद भी शांत क्यों हैं? क्या भाजपा ने उन्हें इस चुप्पी के बदले उनके राज्यों में कोई इनाम देने का वादा किया है?

Share This News :