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क्या मंत्रिमंडल में किसी और को काबिल नहीं समझते CM मोहन यादव ये इतने महत्वपूर्ण विभाग एक ही व्यक्ति के पास क्यों ?

ग्वालियर (विनय शर्मा) : लोकतंत्र में सत्ता का सबसे बड़ा सौंदर्य उसका विभाजन है। विभाग अलग-अलग मंत्रियों को सौंपे जाते हैं ताकि न केवल ज़िम्मेदारी स्पष्ट रहे बल्कि जनता तक जवाबदेही भी बनी रहे। लेकिन मध्यप्रदेश में स्थिति इसके ठीक उलट नज़र आ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शपथ ग्रहण के बाद जिन विभागों को अपने पास रखा था, वे आज भी (अगस्त 2025 तक) बड़े पैमाने पर उन्हीं के पास हैं। इनमें गृह (Home), सामान्य प्रशासन (GAD), जनसंपर्क (PR), जेल, खनन (Mining), औद्योगिक नीति एवं निवेश संवर्धन (Industry & Investment Promotion), नागरिक उड्डयन (Civil Aviation), नर्मदा घाटी विकास (NVDA) और लोक सेवा प्रबंधन जैसे 11 से अधिक विभाग शामिल हैं।

सत्ता का केंद्रीकरण या प्रशासनिक मजबूरी?

कहा जाता है कि मुख्यमंत्री अपनी टीम पर विश्वास जताकर विभाग बाँटते हैं। परंतु यहाँ स्थिति उलट है। सुरक्षा (Home) से लेकर प्रशासन (GAD) और सूचना नियंत्रण (PR) तक सब कुछ एक ही व्यक्ति के पास होना न केवल शक्ति-संतुलन को तोड़ता है, बल्कि जवाबदेही की रेखा को भी धुंधला कर देता है। सवाल उठना लाज़मी है कि क्या यह निर्णय प्रशासनिक मजबूरी थी या सत्ता के केंद्रीकरण की सुनियोजित रणनीति?

प्रारंभिक आवंटन (दिसंबर 2023): शपथ के तुरंत बाद ही डॉ. यादव ने गृह, GAD, PR, जेल, खनन, उद्योग-निवेश संवर्धन, नागरिक उड्डयन आदि अपने पास रखे।

अगस्त 2025 तक कोई पुनः आवंटन नहीं: MPInfo व सरकारी नोटिफिकेशनों में अब तक ऐसा कोई आदेश नहीं दिखा जो यह दर्शाए कि ये विभाग किसी अन्य मंत्री को सौंपे गए हों।

CMO में लगातार अफ़सरशाही बदलाव: पिछले 18 महीनों में मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में कई बार ACS/Principal Secretary बदले गए। यानी विभाग तो CM के पास रहे लेकिन काम करने वाले अधिकारियों को बार-बार बदला गया।

 

जवाबदेही पर गहरे सवाल

1. पारदर्शिता पर असर: जब गृह और जनसंपर्क दोनों मुख्यमंत्री के पास हों तो सूचना का प्रवाह एक ही हाथ से नियंत्रित होता है। ऐसे में स्वतंत्र और निष्पक्ष सूचना जनता तक कैसे पहुँचेगी?

2. हितों का टकराव : खनन और औद्योगिक निवेश दोनों विभाग एक ही व्यक्ति के पास होना संभावित हितों के टकराव को जन्म देता है। क्या उद्योगपतियों और खनन लॉबी को सीधे मुख्यमंत्री स्तर पर लाभ पहुँचाने का रास्ता आसान नहीं हो जाता?

3. प्रशासनिक अस्थिरता: बार-बार अधिकारियों का बदलना यह दर्शाता है कि फैसले निरंतरता के बजाय व्यक्तिपरक हो सकते हैं। इससे लंबी अवधि की योजनाएँ अधर में लटक जाती हैं।

 

विपक्ष और जनता के लिए प्रश्न

क्या मुख्यमंत्री इतने विभाग अपने पास रखकर जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं?

क्या राज्य की प्रशासनिक मशीनरी का संतुलन केवल एक व्यक्ति पर टिका रहना चाहिए?

क्या यह लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ नहीं है कि कैबिनेट के अन्य मंत्री केवल औपचारिकता बनकर रह जाएँ?

बार-बार CMO में बड़े पैमाने पर अधिकारियों का स्थानांतरण क्या पारदर्शिता की कमी नहीं दर्शाता?

राज्य की जनता यह जानने का अधिकार रखती है कि मुख्यमंत्री ने इतनी बड़ी संख्या में विभाग अपने पास क्यों रखे। क्या कैबिनेट में सक्षम चेहरे नहीं हैं? या फिर यह केवल नियंत्रण की राजनीति है? लोकतंत्र में शक्ति का केंद्रीकरण अंततः जनता के लिए नुकसानदेह साबित होता है क्योंकि इससे न तो नीतियों पर बहस होती है और न ही जवाबदेही तय होती है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास आज भी 11 से अधिक अहम विभाग हैं। यह केवल एक प्रशासनिक तथ्य नहीं बल्कि लोकतांत्रिक चेतना के लिए गंभीर प्रश्न है। जनता को यह सोचना होगा कि क्या वे एक ऐसे सिस्टम में सुरक्षित हैं जहाँ सत्ता का केंद्रीकरण निरंतर बढ़ रहा है और जवाबदेही का दायरा लगातार सिमट रहा है।

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