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बसंत पंचमी के बाद शुरू होगा यूपी में 'भगवा' प्रचार, पीएम मोदी करेंगे एक दर्जन रैलियां

बिहार चुनाव से सीख लेते हुए यूपी में भारतीय जनता पार्टी ने रणनीति में तेजी से बदलाव करते हुए असम मॉडल को लागू करने का फैसला कर लिया है. इसी क्रम में पीएम मोदी की रैलियों को काफी कम कर दिया गया है.

पता चला है कि एक फरवरी को बसंत पंचमी के बाद यूपी में सात चरण के चुनावों के लिए पीएम की एक दर्जन रैलियां शुरू हो जाएंगीं. इनमें पहले और दूसरे चरण के लिए पीएम की रैलियां, 4 फरवरी से शुरू होगी. इसके बाद 7, 10 और 12 फरवरी को रैली होनी है. हालांकि पार्टी की तरफ से अभी तक इन रैलियों के स्थलों का चयन नहीं किया गया है.

पिछले साल बिहार चुनाव में पीएम ने करीब दो दर्जन रैलियां की थीं. वहीं इससे पहले दिल्ली जैसे छोटे राज्य में भी पीएम की सात रैलियां हुई थीं. इन दोनों ही राज्यों में पार्टी की करारी हार के बाद पार्टी के भीतर से इस चुनावी रणनीति पर सवाल उठे थे. यह पूछा गया था कि आखिर पीएम को इस तरह चुनाव प्रचार में झोंकने की क्या जरूरत थी.

अब यूपी में भाजपा ने असम मॉडल को अपनाते हुए सकारात्मक मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है. पार्टी व्यक्तिगत आक्षेप लगाने की बजाए, मुद्दों पर विपक्षी नेताओं को घेरने का प्रयास करेगी. यहीं नहीं बिहार का हश्र देखते हुए बाहरी मुद्दा चुनाव में हाइलाइट न हो जाए, इसके लिए पार्टी ने दूसरे राज्यों से नेताओं को यूपी में ज्यादा संख्या में न बुलाने का फैसला भी किया है.

हालां​कि असम में पार्टी ने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था, जैसा यूपी में नहीं किया गया है. पार्टी का कहना है कि यूपी में सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा.

पार्टी ने सभी फेजों के लिए अलग-अलग चुनावी रैलियों की रणनीति बनाई है, जिसमें कुछ फेजों के लिए रैलियों की संख्या ज्यादा रहेगी, वहीं कुछ में एक रैली ही होनी है. इनमें सबसे ज्यादा जोर पश्चिम उत्तर प्रदेश के पहले, दूसरे और तीसरे चरण पर रहेगा, इसके बाद आखिरी फेज में रैलियों की संख्या बढ़ सकती है. क्योंकि भाजपा इस बार पूर्वांचल में बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश में है. वैसे चुनाव घोषित होने के पहले ही परिवर्तन यात्रा के दौरान पीएम ने प्रदेश के हर कोने में जाकर छह रैलियों को संबोधित किया था.

उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 8 मार्च के बीच सात चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के अखिलेश धड़े के बीच गठबंधन के बावजूद बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा.

केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद जिस तरह से बीजेपी को दिल्ली और बिहार में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. वैसे में उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है. मुख्यमंत्री चेहरे को सामने न लाकर एक बार फिर बीजेपी ने पीएम मोदी के चेहरे पर दांव खेला है. इसका कितना फायदा उसे इन चुनावों में मिलेगा वह 11 मार्च को सामने आ ही जाएगा.

इस बार उत्तर प्रदेश चुनावों में समाजवादी पार्टी में मचे घमासान के अलावा प्रदेश की कानून-व्यवस्था, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और विकास का मुद्दा प्रमुख रहने वाला है. जहां एक ओर बीजेपी और बसपा प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर अखिलेश सरकार को घेर रही हैं, वहीं विपक्ष नोटबंदी के फैसले को भी चुनावी मुद्दा बना रहा है.

यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं. 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने 224 सीट जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. पिछले चुनावों में बसपा को 80, बीजेपी को 47, कांग्रेस को 28, रालोद को 9 और अन्य को 24 सीटें मिलीं थीं.

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