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लालबत्ती से नहीं हूटर से तौबा करें

ग्वालियर। हाल ही में उत्तरप्रदेश में बनी भाजपा सरकार ने लालबत्ती लगाने से तौबा कर रहे हैं। राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लाल बत्ती गाड़ी नहीं, उसमें लगने वाले हूटरों से तौबा कर ध्वनि प्रदूषण से बचने का प्रयास करना चाहिये। हाल ही में विधानसभाओं के सम्पन्न हुये चुनावों के बाद बने मुख्यमंत्रियों ने वीआईपी कल्चर से बचने के लिये लाल बत्तियां अपने वाहनों पर नहीं लगाने का फैसला किया है। वैसे इन मुख्यमंत्रियों का फैसला कुछ हद तक सही भी है। वहीं इन मुख्यमंत्रियों को अपने वाहनों में लगने वाले हूटर संस्कृति को भी समाप्त करने के लिये जोर देना चाहिए। 
प्राय: देखा गया है कि आजकल नेताओं से लेकर छुटभैय्यै नेताओं के चौपहिया वाहनों में एक लंबी-चौड़ी प्लेट के पास ही हूटर लगा होगा। यह हूटर जब भी थोड़ी भीड़भाड़ हो या खाली सड़क भी हो उस पर अवश्य बजता हुआ मिलेगा। इतना ही नहीं महानगर से लेकर कस्बों में चलने वाली एम्बुलेंस ने भी हूटर को स्टेटस सिंबल बना लिया है। हालांकि ध्वनि प्रदूषण के चलते न्यायालय ने भी हूटरों के खिलाफ आदेश दिये हैं। फिर भी एम्बुलेंस से लेकर छुटभैय्ये नेताओं के वाहनों में हूटर लगातार बजकर ध्वनि प्रदूषण फैला रहे हैं। कोई बड़ा नेता काफिले में चले तो उसके पीछे चलने वाले छुटभैय्ये नेताओं के वाहनों से भी लगातार हूटरों के बजने की आवाजें आमतौर पर सुनी जा सकती हैं। यह लोग अपने वाहन को जाम में फंसते ही हूटर की तेज आवाज करते हैं। इतना ही नहीं पुलिस की खाली चौपहिया, हल्के बड़े वाहन से लेकर ट्रकों में भी हूटर लग गये हैं। यह सब स्टेटस सिंबल की निशानी बन गये हैं। हमारा नये राज्यों के मुख्यमंत्रियों से अनुरोध है कि वाहनों पर भले ही लालबत्ती लगी रहे लेकिन हूटरों की संस्कृति को बंद कर ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति दिलाना चाहिए।

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