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व्यक्ति को बिना आशक्ति के जीवन जीने का लक्ष्य बनाना चाहिए : प्रो. सोलंकी

ग्वालियर । हरियाणा प्रदेश के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा है कि आशक्ति के बिना जीवन जीने का लक्ष्य बनाना और आगे बढऩे वाले व्यक्ति ही समाज में अपनी अलग पहचान बनाते हैं। ग्वालियर के श्रीधर पराडकर  à¤¨à¥‡ इसे अपने जीवन में उतारकर उदाहरण प्रस्तुत किया है। प्रो. कप्तान सिंह ने रविवार को मेडीकल कॉलेज के सभागार में मध्य भारतीय हिंदी साहित्य सभा द्वारा आयोजित नागरिक अभिनंदन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में यह बात कही। 
कार्यक्रम में उत्तम स्वामी, केन्द्रीय पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया, नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्रीमती माया सिंह, महापौर  à¤µà¤¿à¤µà¥‡à¤• नारायण शेजवलकर, जिला अध्यक्ष देवेश शर्मा, हिंदी साहित्य सभा के उपाध्यक्ष राजकिशोर वाजपेयी सहित ग्वालियर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष अभय चौधरी, साडा अध्यक्ष राकेश जादौन सहित अन्य जनप्रतिनिधि और बडी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। 
हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि बिना किसी आशा के समाज और देश के लिये कार्य करने वाले लोग बिरले होते हैं। श्रीधर पराडकर  à¤¨à¥‡ अपना पूरा जीवन सामाजिक कार्यों के लिये बिना किसी आशा के और उम्मीद के समर्पित किया है। उन्होंने साहित्य के माध्यम से समाज को एक नई दिशा देने का सराहनीय कार्य किया है। श्रीधर पराडकर को साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने पर भारत सरकार की ओर से विवेकानंद सम्मान से भारत के राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया है। 
प्रो. कप्तान सिंह ने कहा कि जीवन में एक लक्ष्य निर्धारित कर उसके लिये पूरा जीवन जीना एक कठिन कार्य है। श्रीधर पराडकर  à¤¨à¥‡ अपना पूरा जीवन समाज के कार्यों के लिये समर्पित किया है। हम सबको उनके कार्यों को सामने रखकर अपने जीवन में भी इसी प्रकार के कार्य करने की आवश्यकता है। 
कार्यक्रम में  à¤‰à¤¤à¥à¤¤à¤® स्वामी ने कहा कि दुनिया में कई प्रकार के काम होते हैं। साहित्य दान भी उनमें से एक है। श्रीधर पराडकर  à¤¦à¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ साहित्य दान के माध्यम से समाज में एक ऊर्जा जगाने का सराहनीय कार्य किया गया है। उन्होंने कहा कि अपने और अपने परिवार के लिये तो हर कोई जीता है परंतु समाज के लिये जीने वाले लोग लम्बे समय तक समाज का मार्ग प्रशस्त करते हैं, श्रीधर पराडकर  à¤‰à¤¨à¤®à¥‡à¤‚ से एक हैं।  à¤‰à¤¤à¥à¤¤à¤® स्वामी ने कहा कि ज्ञान दान से बडा कोई दान नहीं होता है। किताबों में लिखी ज्ञान की बातें व्यक्ति लम्बे समय तक पढ़ता है और उसे अपने जीवन में उतारता है। श्रीधर पराडकर  à¤¦à¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ लिखी गई पुस्तकें युवाओं के लिये प्रेरणा का स्त्रोत बनेंगी और युवा उन किताबों से सीख लेकर समाज के हित में कार्य करेंगे। 
कार्यक्रम के प्रारंभ में श्रीधर पराडकर  à¤¨à¥‡ कहा कि मेरे द्वारा जो भी पुस्तकें लिखी गईं, उसका निर्णय मेरा नहीं था। संघ द्वारा जो भी विषय दिए गए उन पर मेरे द्वारा लिखा गया है। भारत सरकार की ओर से मुझे जो पुरस्कार मिला हैए वह पुरस्कार मेरा नहीं, आप सबका है। पुरस्कार के रूप में मुझे मिली पाँच लाख रूपए की राशि को मैंने मध्यभारत हिंदी साहित्य सभा को समर्पित कर दी है। 
श्रीधर पराडकर  à¤¨à¥‡ कहा कि मैं कल भी एक कार्यकर्ता था और आज भी एक कार्यकर्ता ही हूँ।  à¤®à¥‡à¤°à¤¾ आगे का जीवन भी एक कार्यकर्ता के रूप में समर्पित रहेगा। उन्होंने कहा कि मुझे जीवन में समर्पित के कार्य करने की प्रेरणा मेरे पिता से प्राप्त हुई और साहित्य और आध्यात्म की सीख मेरी माँ से मिली है। मेरे परिवार से मिली सीख को ही मैंने आगे बढ़ाने  à¤•ा कार्य किया है और करता रहूँगा। 
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों द्वारा श्रीधर पराडकर  à¤•ा शॉल, श्रीफल और स्मृति चिन्ह देकर नागरिक अभिनंदन किया गया। श्रीमती कुसुम लता भदौरिया द्वारा श्रीधर पराडकर  à¤•े सम्मान में लिखे अभिनंदन पत्र का वाचन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने भी श्रीधर पराडकर  à¤•ा अभिनंदन किया। 
कार्यक्रम संयोजक  à¤°à¤¾à¤œà¥‡à¤¶ सोलंकी ने श्रीधर पराडकर  à¤•े जीवन पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रीधर पराडकर  à¤•े जीवन से जुडी कई अनछुईं बातें भी बताईं। कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। माधव महाविद्यालय के छात्र.छात्रओं द्वारा सांस्कृतिक गीत के माध्यम से स्वागत किया गया।

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