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त्यौहार का अखिलेश ने उठाया फायदा, मायावती से जोड़ा ऐसा रिश्ता जो उन्हें लगता है बुरा!

उत्तर प्रदेश की सियासत में आए दिन नए-नए बदलाव हो रहे हैं। चुनाव से पहले हो रहे इन पॉलिटिकल ड्रामों के बीच मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक बार फिर बुआ का नाम ले लिया है। शुक्रवार को लखनऊ में एक कार्यक्रम में बोलते हुए अखिलेश यादव की जुबान पर जब बुआ शब्द वापस आया तो सब हैरान रह गए।
राजधानी लखनऊ में धनतेरस के दिन स्कूली बच्चों के लिए मुफ्त बर्तन देने की योजना की शुरुआत की। इस दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लोगों को त्यौहार की बधाई तो दी ही, साथ ही इस त्यौहार का सियासी फायदा भी उठा लिया। बुआ शब्द से तौबा कर चुके भतीजे अखिलेश यादव ने कहा कि आज त्यौहार है और इसका फायदा उठाते हुए मैं कहूंगा कि बुआ ने तो जीते जी अपनी मूर्तियां लगवा दी हैं। बुआ कहकर भी अखिलेश ने इस बात का सियासी फायदा उठाया और हमेशा पत्थरों के स्मारक और मूर्तियों के लिए तंज कसने वाले सीएम ने इस मौके पर भी मायावती की पत्थरों की मूर्तियों को अपने निशाने पर लिया।
दरअसल, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बुआ शब्द से मायावती भी खास खुश नहीं होती हैं। इसी वजह से जब अखिलेश यादव ने उन्हें बुआ कहना बंद कर दिया था तो इस बारे में सवाल पूछने पर उन्होंने पत्रकार को ही झिड़क दिया था। वैसे, अखिलेश यादव मायावती को बुआ कहने के इतने आदी हो चुके हैं कि एक बार उन्होंने मायावती का नाम लेकर सवाल पूछ रहे एक पत्रकार को डांटते हुए कहा था कि वो बड़ी हैं, उन्हें बुआ कहा करो।
बुआ-भतीजे की इस सियासी जुबान के बीच सुबह जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने त्यौहार का फायदा उठाकर एक बार फिर मायावती को बुआ कहा, तो दोपहर तक बुआ मायावती ने अखिलेश सरकार के खिलाफ एक प्रेस नोट जारी कर दिया। मायावती ने इस प्रेस नोट में अखिलेश की योजनाओं पर सवाल तो उठाया ही, साथ ही ये भी कह दिया कि उनकी सरकार आने पर समाजवादी सरकार की बड़ी आर्थिक योजनाओं की जांच की जाएगी।
दरअसल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी राजनैतिक विरोधी और बीएसपी सुप्रीमो मायावती को बुआ कहकर संबोधित करते थे,पर पिछले दिनों जब अखिलेश यादव को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के बाद विवाद की शुरुआत हुई थी, उस दौरान अखिलेश यादव ने कहा था कि वो अब से मायावती को बुआ बोलना बंद कर देंगे, पर वो खुद को इस बार रोक नहीं पाए।
त्यौहार पर वापस आए इस ‘बुआ’ शब्द को क्या अखिलेश यादव भुला पाएंगे या हमेशा की तरह दो सियासी विरोधी बुआ-भतीजे के नाम से सियासी गलियारों में जाने जाएंगे ये वक्त के साथ ही साफ हो पाएगा?

 

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