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हार्ट ऑफ एशिया सम्‍मेलन में भारत को झटका, ऐसे बदला रूस का रुख, पाक की कूटनीतिक जीत..!

अफगानिस्तान को लेकर हुए हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन का चित्र इस बार बदल-बदला-सा दिखा। चूंकी इस बार पाकिस्तान पूरी कूटनीतिक तैयारी से आया, इसलिए वह भारतीय कूटनीति पर भारी भी पड़ा। हालांकि एक बार फिर अफगानिस्तान ने पाकिस्तान को आतंकवाद की जमीन कहा, और साफ शब्दों में पाकिस्तान की आलोचना करते हुए कहा कि पाकिस्तान भले उसे आर्थिक मदद दे या नहीं, अपने देश से आतंकवाद का निर्यात करना वह बंद करे।

अफगानिस्तान के इस बयान को भारतीय कूटनीतिज्ञ अपनी जीत के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, लेकिन इसी सम्मेलन में रूस ने पाकिस्तान का बचाव किया है और भारतीय कूटनीतिज्ञों को साफ शब्दों में कहा कि जिस प्रकार भारत की ओर से पाकिस्तान पर कूटनीतिक आक्रमण हो रहा है, उससे दोनों देशों को कोई लाभ होने वाला नहीं है।

दरअसल, यह सम्मेलन अफगानिस्तान के माध्यम से क्षेत्र में शांति के लिए हुआ, न कि दो देशों के बीच आक्रामक कूटनीतिक आलोचनाओं के लिए। भारत को रूस ने सलाह दी कि इस प्रकार के आपसी आक्रामकता को शांति के लिए काम करने वाले मंचों पर नहीं उठाया जाना चाहिए। रूस का यह बदला हुआ तेवर भारत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। बता दें कि हॉर्ट ऑफ एशिया सम्मेलन का मकसद  à¤®à¤§à¥à¤¯ एशिया और अफगानिस्तान की शांति रहा है।

बहरहाल, विगत् कुछ दिनों में दुनिया की स्थिति जबरदस्त तरीके से बदली है। सीरियाई अभियान में रूस के शामिल होते ही एशिया में नाटो की पकड़ कमजोर होने लगी है। पाकिस्तान दिन-ब-दिन रूसी खेमे के निकट होता जा रहा है। इधर, विगत् दिनों रूस ने पाकिस्तान के साथ हथियार की बड़ी डील की, साथ ही रूसी सेना ने पाकिस्तान की सेना के साथ युद्धाभ्यास भी किया। हाल ही में जो बेहद महत्वपूर्ण खबर आई वह यह है कि अब रूसी सेना पाकिस्तान के ग्वाल्दर बंदरगाह का सामरिक उपयोग भी करेगा।

दरअसल, पाकिस्तान की रणनीति बड़ी तेजी से बदल रही है। वह पहले से अमेरिका के निकट रहा है, जबकि इन दिनों उसने चीन और रूस के साथ भी अपनी नजदीकी बढ़ा ली है। इसका प्रभाव भी अब साफ दिखने लगा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अभी तक चीन ही उसकी तरफदारी करता दिखता था, लेकिन अब रूस भी भारत को आंखें दिखाने लगा है। यह संकेत कुछ अच्छे नहीं है।

देखा जाए तो जो लोग विदेशनीति को लेकर महज कुछ बिन्दुओं पर सकारात्मक बयान से ही अपनी पीठ थपथपाने लगते हैं, उन्हें गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर चीन और रूस का एक साथ पाकिस्तान की ओर झुकना भारत की कूटनीति के लिए कितना हितकर होगा? हालांकि मामला यह मंच बेहद छोटा था, लेकिन चीन के साथ ही साथ रूस ने जो पाकिस्तान के पक्ष में स्टेंड लिया, वह निर्विवाद रूप से प्रकारांतर में भारत को घाटा पहुंचाएगा। यह कोई साधारण बात नहीं है। यह भारत की विदेशनीति का एतिहासिक मामला साबित होगा क्‍योंकि जो रूस कल तक भारत के पक्ष में खड़ा होता था, वही अब कई मोर्चों पर भारत को हानि भी पहुंचा सकता है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि हार्ट ऑफ एशिया सम्‍मेलन से वर्तमान सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठते हैं, लेकिन जो स्थितियां सामने आ रही हैं, उसमें भारत को बड़ी गंभीरता से अपनी रणनीति बनानी होगी। दूसरी ओर हमारे जो कूटनीतिज्ञ अमेरिका की ओर अपना झुकाव जगजाहिर करते जा रहे हैं, उन्‍हें इस बारे में कुछ सोचना होगा, क्‍योंकि अमेरिका के नये राष्ट्रपति डोनॉल्‍ड ट्रंप ने विगत् दिनों एक बयान के माध्यम से साफ कर दिया कि उनकी सरकार भारत और पाकिस्तान को एक ही नजरों से देखेगी। हालिया बयान में ट्रंप ने कहा था कि पाकिस्तान अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण देश है, उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान बड़ा प्यारा देश है।

यकीनन, इस पूरे परिदृश्‍य में अब भारतीय कूटनीतिज्ञों को समझ लेना चाहिए कि जब पाकिस्तान के साथ भारत जूझेगा तो उसके लिए विश्‍व समुदाय के ताकतवर देशों में से भारत के पक्ष में कौन खड़ा होगा? अब भारत को सोचना होगा कि आखिर वह किस रास्ते चले?

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