महाराजा की जमीन पर राजा का बेटा करेगा राज ?
विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस ने भी ग्वालियर चंबल अंचल में सक्रियता बढ़ा दी है। इस क्रम में पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री प्रियंका गांधी 21 जुलाई को ग्वालियर के मेला मैदान में सभा को संबोधित करेंगी। सभा में एक लाख लोग जुटाने का दावा किया जा रहा है। इस भीड़ को जुटाने की जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने उठाई है। इसके लिए वे मंगलवार से ग्वालियर-चंबल अंचल के दौरे पर आए हैं। पहले दिन उन्होंने दतिया में पीतांबरा पीठ में दर्शन करने के बाद कार्यकर्ताओं की बैठक की। वे बुधवार और गुरुवार को ग्वालियर में इसी तरह की बैठक लेंगे। दरअसल, दिग्विजय सिंह की अंचल में सक्रियता की वजह अपने बेटे और विधायक जयवर्धन के लिए जमीन तैयार करना है। क्योंकि सिंधिया के कांग्रेस में रहने के दौरान उनकी इस अंचल में एक नहीं चली।
पूर्व मुख्यमंत्री का भले ही भोपाल से लेकर दिल्ली तक वर्चस्व है। किंतु उनकी महत्वकांक्षा ग्वालियर-चंबल की किलेदारी संभालने की रही है। उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा सिंधिया परिवार बना रहा, लेकिन अब महल का कांटा निकल गया है। अब दिग्विजय सिंह की इच्छा है कि अंचल की किलेदारी उनके बेटे जयवर्धन सिंह संभालें। इसके लिए वे समय-समय पर प्रत्यक्ष रूप से इसकी भूमिका भी बनाते नजर आते हैं। सिंधिया के कांग्रेस से जाने के बाद अंचल में गांधी परिवार के सदस्य का पहला नगर आगमन है। इस सभा के बहाने दिग्विजय सिंह की कोशिश होगी कि सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद विकल्प के रूप में जयवर्धन का नाम सामने आए। हालांकि अंचल में नेता प्रतिपक्ष डा़ गोविंद सिंह, पूर्व मंत्री केपी सिंह व प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अशोक सिंह सक्रिय हैं। अजय सिंह ने अंचल का प्रभारी बनने के बाद यहां सक्रियता दिखाई है। दिग्विजय सिंह से जुड़े नेताओं को अजय सिंह का अंचल की राजनीति में दखल रास नहीं आ रहा है इसलिए प्रियंका की सभा के बाद उनको चुरहट में सक्रियता बढ़ाने के निर्देश हाइकमान से मिल सकते हैं।
दिग्विजय सिंह ने जयवर्धन को सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित करने अपने समर्थकों को सक्रिय कर दिया है। प्रियंका की सभा के बाद यह तय हो जाएगा कि अंचल के संबंध में हर फैसले राधौगढ़ की मुहर लगने के बाद ही होगा। सभा के बाद जयवर्धन सिंह अंचल में पूरी तरह से सक्रिय नजर आएंगे।दिग्विजय सिंह का अंचल की किलेदारी को लेकर सिंधिया परिवार से शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है। 10 वर्ष तक लगातार प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहने के बाद भी महल के कारण ग्वालियर-अंचल को लेकर स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले पाए। संगठन से लेकर सरकार में नियुक्तियों को लेकर राजी या गैर राजी उन्हें महल का निर्णय मानना पड़ता था। इसी कारण वर्षों तक उनके समर्थक हांसिये पर रहे, क्योंकि महल का दबदबा गांधी परिवार में दिग्विजय सिंह से अधिक नहीं तो कमतर भी नहीं था। यही कारण है कि कांग्रेस में अंचल के संबंध में होने वाले फैसले पर महल का अनापत्ति प्रमाण पत्र जरूरी होता था। यह बात दिग्विजय को आंतरिक रूप से परेशान करती रही।