बलात्कार के निरंतर बड़ते मामलों पर लगाम कैसे कसी जाए : गुरुदत्त शर्मा
प्रश्न बहुत गहरा है की रेप के निरंतर बड़ते मामले पर लगाम कैसे लगाई जाए ?
कड़े कानून, जल्द सुनवाई, अभियुक्त (आरोपी) की पैरवी के लिए वकील हो या न हो, मर्सी पिटीशन, रिव्यू पिटीशन हो या न हो? राज्य सरकार की भूमिका क्या होनी चाहिए ?और सबसे महत्वपूर्ण झूठे रेप केस का क्या किया जाए? ऐसे तमाम प्रश्न एक आम ' बौद्धिक' वर्ग के मन में है।
वर्तमान परिदृश्य में देखा जाए तो रेप एक बहुत ही घिनौना शर्मनाक अक्षमणीय अपराध है, यह एक अपराध मात्रा नही अपितु जघन्य अपराधो की श्रेणी में आने वाला विभात्स्य कृत्य है और यह कृत्य दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। निर्भया केस, कठुआ केस, उन्नाव केस, ग्वालियर केस, समूचे भारत का शायद ही कोई ऐसा जिला होगा जहा रेप केस दर्ज ना हुआ हो ?
कही एफआईआर दर्ज नहीं होती, कही करवाई नहीं की जाती, रसूखदार धन बल से पीड़िता के समूचे परिवार को ही खरीद लेते है, या फिर उन्हें मरवा देते है, अगर बच भी जाए तो हमारा कानून जो कड़ा होने ( निचली अदालत को फांसी की सजा जैसे कठोर सजा देने का अधिकार प्राप्त है) के साथ उसके लचीलेपन का फायदा उठा के सरेआम अपने गौरवान्वित भरे का कार्य का दम हकता फिरता है। सरकार प्रशासन इस लचीले वैशाखी का सहारा लेके अपने निकम्मेपन का एहसास समय समय पर कराते रहते है।
प्रश्न है की क्या किया जाए ?
सीधे जननांग काट दिए जाए ? सरेआम चौराहों पर लटका दिया जाए ? गोली मार दी जाए ? पत्थर मार मार के मुक्ति दी जाए ? आदि....
उपरोक्त में से आप किसी भी एक सजा के समर्थक है तो ये अवश्य ध्यान रखिएगा की ये किसी भी विकसित लोकतांत्रिक देश के कानून में इनका प्रावधान नहीं है। यह सिर्फ सरिया तानाशाही राष्ट्र के कानून में इनका प्रावधान है और वही ये शोभित भी होते है।
होने का कारण क्या है??
प्रारब्ध में अगर आप पड़ेंगे या तो रेप जैसे दुष्कर्म हमे सुनने में कम ही मिलते है, क्योंकि हमारे सनातन धर्म और हमारे संस्कार शिक्षा में पराई स्त्री को माता या बहन की नजरो से ही देखा ही नहीं जाता था अपितु माना भी जाता था। जैसे जैसे हमारे यहां पाश्चात्य सभ्यता द्वारा हमारी सनातन सभ्यता का अतिक्रमण किया गया और अभी भी जारी है, उसका परिणाम हमे विभिन्न प्रकार के वीभत्स कांडो के रूप में सामने आ रहे है। और इसमें मुख्य भूमिका सरल इंटरनेट , सोशल मीडिया, सिनेमा जैसे प्लेटफार्म ने निभाई है। बहन बेटियों को देखने का नज़रिया ही बदल दिया है।
हर खूबसूरत, कामुक औरत को हम अपनी वासना का शिकार बनाना चाहते है, लगभग हर औरत हमे कुल्टा नजर आती है। हमारे मन में सदैव कामुकता की बाड़ आई हुई है। जिसका उतारा नही होता और इसमें गलती सिर्फ पुरुष की ही नहीं है अपितु महिलाओं की भी है, सोशल मीडिया पर अपने यौवन और शरीर का प्रदर्शन किया जाना, मूवीज में महिला का अश्लील चित्रण किया जाना,जैसे तमाम गतिविधियों में महिला का लिप्त होना आदि तमाम चीजे है जो चिंतनीय है।
अब बात करते है कानून की, कैसे इन्हे रोका जाए? नियंत्रण कैसे हो?
किसी भी अपराध का नियंत्रण उसके मूल में होता है, आगर आप पड़ेंगे तो जानेंगे की चाणक्य ने भी कठोर दण्ड देने का प्रावधान किया है, हमारे शास्त्रों में भी 'भय बिन होई न प्रीत ' का उल्लेख अब चुकी बात ये है की लोकतंत्र में कड़े कानून बनाना और उसे लागू करवाना बहुत कठिन है, एक तरफ न्याय देना है और दूसरी तरफ सबूतों और साक्ष्य के आधार पर किसी बेगुनाह को सजा न हो जाए इस चीज का भी ध्यान रखना है। या किसी रसूखदार अपने रसूख दिखाकर धनबल से किसी बेगुनाह को खरीदकर अपना जुर्म उस पर डाल दे। झूठे रेप केस एक इसका अपवाद है और इन सब पहलुओं पर विचार करते हुए ही हमारे देश के कानून निर्माण होताआया है जो काफी हद तक सही भी है। 'प्रोविन अंटिल गिल्टी' जिसका सीधा सा मतलब है की जब तक साबित न हो जाए तब तक अभियुक्त बेगुनाह समझा जाता है। उसके अपराध को साबित करने की जिम्मेदारी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की है और सबूत इकठ्ठे करने की जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की, मुजरिम का पक्ष रखने, अपनी बात कहने का अधिकार भी प्राप्त है और ये सही भी एक हद तक जब तक की अपराध सिद्ध न हो जाए। उसके पश्चात इसे विभास्त्य अपराध के लिए किसी भी प्रकार के क्षमा प्रार्थना का प्रावधान नहीं होना चाहिए। एक बारी निचली अदालत के फैसले को अंतिम मान के रिव्यू पिटिशन की समय सीमा त्वरित निर्धारित कर सजा को तमिल किया जाना चाहिए। कड़े कानून बनाना हमारी संसद का काम है, अगर वहां भी इस प्रकार के अपराध के दोषी शोभित होंगे तो कैसे हम कानून निर्माण की सोच भी सकते है।
2014 से वर्तमान तक एक सशक्त पूर्ण बहुमत की सरकार द्वारा केंद्र में शासन किया जा रहा है, और उसी सरकार की राजनीतिक पार्टी की सरकार भारत के अधिकांश राज्यों में शासन कर रही है परंतु सबसे ज्यादा मामले इन्ही के शासित राज्यो में देखने को मिल रहे है। 2014 से अभी तक किसी भी प्रकार के कड़े कानून का प्रावधान नहीं किया गया है। करे भी तो कैसे सरकार को सिर्फ नामकरण करने से फुरसत मिले तब न करे..
आईपीसी, सीआरपीसी, साक्ष्य अधिनियम का सिर्फ नाम और इंडेक्स बदला है, कड़े कानून के नाम पर कोई संतोष जनक कदम नही उठाया है। शायद वह भी गत दिवस पूर्व हुए निर्मम हत्या, दुष्कर्म का इंतजार कर रहे थे। कानून का निर्माण करना केंद्र का काम है और उसे लागू करना राज्य सरकार का। यहाँ तो दोनो ही विफल नजर आ रहे है। जब तक कड़ा कानून त्वरित सुनवाई, नही होगी तब बहन बेटियों की आबरू यूंही क्षीण होती रहेगी। हम बस सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाएंगे, मोमबत्ती लेके मार्च निकलेंगे, काली डीपी लगाके, सरकार को कोशने में अपने दिखावे की जिम्मेदारी निभाएंगे। आज मामला पश्चिम बंगाल का है तो भाजपा आंदोलन कर रही है, उन्नाव का था तो कांग्रेस और सपा आंदोलन कर रही थी। हमे राजनेतिक पार्टियों से सीखना चाहिए की मुद्दा चाहे कुछ भी हो अपने उद्देश्य से कभी भी हटाना है, चाहे फिर कांग्रेस हो, भाजपा हो, टीएमसी, हो या अन्य दल इस हमाम में सभी नंगे है।
जब तक हमारे अंतर्मन से महिला के प्रति नजरिया नही बदलेगा, किसी के साथ हुआ गलत स्वयं के साथ हुआ गलत नही लगेगा तब तक हम बस सिर्फ एक "राजनीतिक शिकार" बनके रहेंगे।
– गुरुदत्त शर्मा ✍