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ब्लैकआउट मॉकड्रिल में खुली प्रशासन की पोल: सायरन बजता रहा, लेकिन स्ट्रीट लाइट्स बुझाना भूले अफसर; ऊर्जा मंत्री सवालों के घेरे में

ब्लैकआउट मॉकड्रिल में प्रशासनिक चूक: जनता ने निभाई जिम्मेदारी, पर स्ट्रीट लाइट्स ने खोली पोल

ग्वालियर: शहर में सुरक्षा अभ्यास के तहत आयोजित मॉकड्रिल ब्लैकआउट प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गया। जहां एक ओर नागरिकों ने अनुशासन का परिचय देते हुए अपने घरों की सारी लाइटें बुझा दीं, वहीं दूसरी ओर शहर की सड़कों पर स्ट्रीट लाइट्स पूरी तरह जगमगाती रहीं। 

गौर करने वाली बात यह रही कि मॉकड्रिल के दौरान पूरे शहर में सायरन बजने लगे—एक संकेत था कि अब अंधेरे की चादर ओढ़ ली जाए। लेकिन सायरन की गूंज के साथ ही जलती स्ट्रीट लाइट्स ने पूरे अभ्यास की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए। स्थानीय नागरिकों ने इस दृश्य को 'अधूरी तैयारी का नमूना' करार देते हुए कहा कि प्रशासन केवल जनता से सहयोग की अपेक्षा कर रहा है, जबकि खुद अपनी व्यवस्थाएं समय पर लागू नहीं कर पा रहा। 

प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर, जो खुद ग्वालियर से विधायक हैं, अब सवालों के घेरे में हैं। विपक्षी दलों और आमजन ने उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठाए हैं। अभी तक ऊर्जा विभाग या नगर निगम की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि स्ट्रीट लाइट्स बंद क्यों नहीं की गईं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी मॉकड्रिल का मकसद सिर्फ जनता की प्रतिक्रिया परखना नहीं, बल्कि प्रशासनिक समन्वय और तत्परता को भी जांचना होता है। लेकिन सायरन की आवाज के बीच रोशनी में नहाई सड़कों ने इस मंशा को ही धुंधला कर दिया। 

मॉकड्रिल जैसी रणनीतिक तैयारियों में छोटी-सी चूक भी गंभीर परिणाम दे सकती है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या प्रदेश ऊर्जा मंत्रालय ने मॉकड्रिल से पहले विद्युत विभाग को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे?

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