संपादकीय: क्या मंदिरों में VIP दर्शन बंद होने चाहिए?
जब हम धार्मिक आस्था की बात करते हैं, तो हमारे मन में सबसे पहली छवि होती है — एक भक्त की, जो पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ अपने ईश्वर के सामने सिर झुका रहा है। आस्था की इस पवित्र भावना में कोई भेदभाव नहीं होता। भगवान सबके हैं, वे अमीर, गरीब, उच्च या निम्न वर्ग के प्रति समान प्रेम और दया रखते हैं। फिर भी आज हमारे देश के कई प्रमुख मंदिरों में एक ऐसी व्यवस्था चल रही है, जो इस मूल भावना को ठेस पहुंचाती है — वह है “VIP दर्शन” की व्यवस्था। सवाल उठता है कि क्या धर्म के इस पवित्र मंदिर में भी किसी को विशेष दर्जा मिलना चाहिए?
मंदिर वह स्थान होता है जहाँ हर इंसान सामाजिक पद, आर्थिक स्थिति या राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर अपने भीतर की सबसे सच्ची भावना के साथ ईश्वर के समीप पहुंचना चाहता है। मंदिर की इस सार्वभौमिकता को बनाए रखना हमारी सभ्यता और संस्कृति की नींव है। जब एक भक्त तपा हुआ सूरज सहकर, लंबी कतार में खड़ा होता है, थकान और भीड़ के बावजूद भगवान का दर्शन करने के लिए तपस्या करता है, और वहीं दूसरी ओर कुछ विशेष व्यक्तियों को आरामदायक, सरल, और कतार से मुक्त “VIP” दर्शन की सुविधा मिलती है — तो यह न केवल धार्मिक आस्था के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि एक सामाजिक असमानता को भी जन्म देता है।
मंदिरों के प्रबंधन और रखरखाव के लिए दान आवश्यक है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन क्या किसी के अधिक दान देने से वह भगवान के करीब हो जाता है? क्या दान देने वाले और आम भक्त के बीच ईश्वर के प्रति भक्ति में कोई रैंकिंग हो सकती है? धर्म का मूल संदेश ही समानता, समर्पण और प्रेम का है। इसलिए यह प्रथा न केवल धार्मिक भावना के साथ अन्याय करती है, बल्कि सामाजिक न्याय की भावना को भी ठेस पहुंचाती है।
इसके अलावा, VIP दर्शन की यह व्यवस्था मंदिरों के व्यावसायीकरण की ओर एक गंभीर संकेत भी है। दर्शन अब भक्ति का एक माध्यम नहीं रह गया, बल्कि एक व्यापार का साधन बनता जा रहा है। “प्रवेश शुल्क” के आधार पर दर्शन कराने की यह प्रथा मंदिर की पवित्रता और गरिमा को ह्रासित कर रही है। यह सोचने की बात है कि क्या मंदिरों को धन के अधीन कर देना सही है, जबकि वे समाज के नैतिक और आध्यात्मिक केंद्र होने चाहिए।
आधुनिक तकनीक और प्रबंधन के साधनों के माध्यम से दर्शन व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाया जा सकता है। ऑनलाइन टिकट बुकिंग, समय स्लॉट निर्धारण और सुव्यवस्थित प्रबंधन से भक्तों को बिना किसी भेदभाव के दर्शन की सुविधा मिल सकती है। इससे न केवल भक्तों की भीड़ में कमी आएगी, बल्कि धार्मिक आस्था की गरिमा भी बरकरार रहेगी।
सरकार और मंदिर प्रबंधन समितियों का यह कर्तव्य बनता है कि वे इस असमान और अनुचित VIP दर्शन प्रथा को समाप्त करें। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ धार्मिक स्थलों पर सभी को समान अधिकार और सम्मान मिले। क्योंकि भगवान की दिव्यता और पवित्रता तभी सुरक्षित रहेगी, जब उनका सान्निध्य हर भक्त को बिना किसी भेदभाव के मिलेगा।
इसलिए, अगर भगवान सभी के हैं, तो मंदिरों का रास्ता भी सभी के लिए समान होना चाहिए — कोई विशेषाधिकार नहीं, केवल समान श्रद्धा और भक्ति।
— संपादक (विनय शर्मा)