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उत्पादन में रिकॉर्ड, ज़मीन पर अंधेरा: बिजली संकट पर सरकार कटघरे में

ग्वालियर : मध्यप्रदेश में बिजली उत्पादन के आँकड़े भले ही रिकॉर्ड तोड़ स्तर पर पहुँच गए हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है। सरकारी रिपोर्ट्स जहां राज्य को 'ऊर्जा सरप्लस' बता रही हैं, वहीं आम जनता 8-8 घंटे की अघोषित बिजली कटौती से बेहाल है। सवाल उठता है कि जब बिजली बन रही है, तो फिर गांव-शहर अंधेरे में क्यों डूबे हैं?

बिजली उत्पादन का सरकारी गणित

ऊर्जा विभाग के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में मध्यप्रदेश ने 1,01,039.88 मिलियन यूनिट (MU) बिजली का उत्पादन किया, जो 2023-24 के मुकाबले 6.2% अधिक है। पिछले पांच वर्षों में कुल उत्पादन में लगभग 14% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

राज्य की कुल स्थापित उत्पादन क्षमता 28,142 मेगावॉट है, जिसमें प्रमुख हिस्सेदारी कोयला आधारित थर्मल पावर की है (16,294 मेगावॉट)। सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 5,156 मेगावॉट, पवन ऊर्जा 2,844 मेगावॉट और जल विद्युत 2,359 मेगावॉट बताई गई है।

तो फिर क्यों बुझा रहता है जनता का चिराग?

जब सरकार हर साल बिजली उत्पादन के नए रिकॉर्ड बना रही है, तो फिर लोगों के घरों में अंधेरा क्यों है? ग्वालियर, मुरैना, शिवपुरी, छतरपुर, टीकमगढ़ जैसे कई ज़िलों से लगातार रिपोर्ट आ रही हैं कि दिन में कई-कई घंटे बिजली बिना किसी पूर्व सूचना के गुल हो रही है।

ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और भी खराब हैं। जहां तापमान 45 डिग्री को पार कर गया है, वहीं बिजली के बिना बुज़ुर्ग, महिलाएं और छोटे बच्चे गर्मी से तड़प रहे हैं।

ऊर्जा मंत्री के दावे और जमीनी सच्चाई

ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर लगातार दावा कर रहे हैं कि “प्रदेश में बिजली की कोई कमी नहीं है।” लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों की पोल खोल रही है। बीते सप्ताह ही मंत्री महोदय ने अस्थाई तौर पर हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है लेकिन हालात जस के तस हैं।

क्या केवल औचक निरीक्षण करने से बिजली आएगी?

क्या आंकड़े गिनवाने से ग्रामीण अंधेरे से बाहर आएंगे?

क्या ट्विटर पर फ़ोटो और वीडियो डालना ही “ऊर्जा मंत्री” की जिम्मेदारी रह गई है?

ऊर्जा नीति में असंतुलन या नियोजन में विफलता?

सरकार कहती है कि बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है और 2022 में पिक डिमांड 17,065 मेगावॉट तक पहुँच गई थी। वहीं सप्लाई की क्षमता मात्र 14,856 मेगावॉट बताई गई थी।

सवाल यह है कि जब उत्पादन इतना बढ़ गया है तो वितरण प्रणाली क्यों चरमरा रही है? क्या ट्रांसमिशन लॉस और फॉल्टी ग्रिड सिस्टम पर काम नहीं हो रहा? क्या सब्सिडी के नाम पर डिस्कॉम को कमजोर किया जा रहा है?

विकास के नाम पर भ्रमजाल?

सरकार ने 2026 तक 15,000 मेगावॉट ग्रीन एनर्जी का लक्ष्य रखा है और ₹2 लाख करोड़ से अधिक निवेश प्रस्तावित हैं। लेकिन जब आज की ज़रूरतें ही पूरी नहीं हो पा रहीं, तो क्या यह दूरगामी योजनाएं सिर्फ चुनावी घोषणा हैं?

आंकड़ों की रोशनी और जनता का अंधकार

मध्यप्रदेश बिजली उत्पादन के आँकड़ों में जरूर चमक रहा है, लेकिन उसकी रोशनी आम जनता तक नहीं पहुँच रही। कागज़ों में दिखने वाली बिजली, जब घरों के पंखे नहीं चला पा रही, तब उसे 'विकास' कहने से पहले दो बार सोचना होगा।

जनता पूछ रही है –

"बिजली बनाई किसके लिए?"

"जब घर में ही अंधेरा है, तो आंकड़े किस काम के?"

 

यह रिपोर्ट सरकारी ऊर्जा एजेंसियों, वर्षवार उत्पादन रिपोर्ट्स और जनता से प्राप्त फील्ड रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार की गई है।

बताए हुए डाटा का सोर्स – 

[Source: MP Electricity Regulatory Commission Annual Reports, MPTransco] 

[Source: Ministry of Power, MP New and Renewable Energy Department] 

[Source: MP Power Management Company Ltd.]

[Source: The Hindu BusinessLine, MP NRE Dept.]

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