एथेनॉल और E20: क्या है यह अवधारणा, कहाँ से आई, क्यों ज़रूरी है, और इसके नुकसान क्या हैं
एथेनॉल एक नवीकरणीय (renewable) ईंधन है जो गन्ने, मक्का, चावल जैसी कृषि फसलों को किण्वन (fermentation) और आसवन (distillation) की प्रक्रिया से गुज़ार कर बनाया जाता है। जब इस एथेनॉल को पेट्रोल में मिलाया जाता है, तो उसे "एथेनॉल ब्लेंडिंग" कहते हैं। मिश्रण में एथेनॉल की मात्रा के हिसाब से इसे E10, E15 या E20 नाम दिया जाता है — यानी E20 का मतलब है 80% शुद्ध पेट्रोल और 20% एथेनॉल का मिश्रण।
भारत में यह E20 ईंधन 2023 से चरणबद्ध तरीके से शुरू हुआ और अप्रैल 2025 तक देशभर के लगभग सभी पेट्रोल पंपों पर अनिवार्य कर दिया गया।
यह अवधारणा कहाँ से आई?
एथेनॉल को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने का विचार कोई नया नहीं है — शुरुआती दौर की गाड़ियाँ भी एथेनॉल पर चलती थीं, लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में सस्ते और भरपूर तेल भंडार मिलने के बाद पेट्रोल मुख्य ईंधन बन गया।
इस अवधारणा को दुनिया में सबसे पहले बड़े पैमाने पर ब्राज़ील ने अपनाया। 1973 के वैश्विक तेल संकट ने ब्राज़ील की आयातित तेल पर निर्भरता को उजागर कर दिया, जबकि देश गन्ने के अतिरिक्त उत्पादन से भी जूझ रहा था। इसी वजह से 1975 में ब्राज़ील सरकार ने "प्रोआल्कूल" (Pró-Álcool) नाम से राष्ट्रीय एथेनॉल कार्यक्रम शुरू किया। इससे पहले भी 1931 में ब्राज़ील में पेट्रोल में 5% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया गया था, और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तेल आपूर्ति बाधित होने पर यह मिश्रण 50% तक पहुँच गया था। 1979 के दूसरे तेल संकट के बाद ब्राज़ील ने पूरी तरह एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियाँ भी उतारीं, और आज भी वह दुनिया के अग्रणी एथेनॉल उत्पादक देशों में शामिल है।
भारत में यह सफर 2000 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ, जब पहली बार कुछ राज्यों में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का प्रयोग हुआ। 2022 में सरकार ने 2030 का E20 लक्ष्य घटाकर 2025-26 कर दिया, जिसे भारत ने समय से पहले ही अप्रैल 2025 में हासिल कर लिया।
यह क्यों ज़रूरी माना जाता है?
सरकार और उद्योग जगत इसे कई मोर्चों पर फ़ायदेमंद बताते हैं:
ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी मुद्रा की बचत: भारत अपनी ज़्यादातर कच्चे तेल की ज़रूरत आयात से पूरी करता है। सरकार के अनुसार एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम से अब तक लगभग 270 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात की जगह ली जा चुकी है, जिससे करीब 1.59 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची है।
किसानों की आय: गन्ना, मक्का जैसी फसलें उगाने वाले किसानों को एथेनॉल आपूर्ति के ज़रिए सीधा भुगतान मिलता है — सरकार का दावा है कि अब तक लगभग 1.18 लाख करोड़ रुपये किसानों तक पहुँचे हैं।
कम प्रदूषण: सरकार का कहना है कि E20 ईंधन से E10 की तुलना में लगभग 30% कम कार्बन उत्सर्जन होता है, और यह इंजन में बेहतर दहन (combustion) और नॉक-रोधी प्रदर्शन देता है।
वैश्विक रुझान: ब्राज़ील (E27-E30) और अमेरिका (E10-E15, कुछ जगह E85) पहले से ही उच्च एथेनॉल मिश्रण अपना चुके हैं। भारत अब E85 और E100 फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा है — 2026 में कुछ पेट्रोल पंपों पर E85 की बिक्री शुरू भी हो चुकी है।
इसके नुकसान और विवाद क्या हैं?
यहीं से मामला गंभीर होता है, क्योंकि दावों और ज़मीनी अनुभव में फ़र्क़ दिख रहा है।
1. माइलेज में गिरावट
संसद में खुद सरकार ने स्वीकार किया है कि E20 से गाड़ी के मॉडल और उम्र के हिसाब से माइलेज में 2% से 6% तक की कमी आ सकती है — पुरानी गाड़ियों में यह गिरावट ज़्यादा है। वहीं LocalCircles के एक सर्वे (36,000 से ज़्यादा जवाब) में 2022 या उससे पहले खरीदी गई गाड़ियों के 80% मालिकों ने माइलेज घटने की शिकायत की। हालांकि सरकार और वाहन निर्माता संगठन SIAM का कहना है कि इससे कोई इंजन फेलियर या बड़ी खराबी सामने नहीं आई है, और मामूली गिरावट के दावे को "बड़े पैमाने पर भ्रामक" बताया गया है।
2. पुरानी गाड़ियों पर असर
अप्रैल 2023 से पहले बिकी गाड़ियाँ E10 के हिसाब से बनी थीं, जबकि उसके बाद की गाड़ियाँ E20-अनुकूल सामग्री (रबर गास्केट, फ्यूल पाइप आदि) से बनती हैं। 20,000 किमी से ज़्यादा चली पुरानी गाड़ियों में रबर पुर्ज़े खराब होने और मरम्मत ख़र्च बढ़ने की शिकायतें मिली हैं, हालाँकि इसे सरकार "सामान्य टूट-फूट" बताती है।
3. खाद्य बनाम ईंधन (Food vs Fuel) की बहस
भारत में एथेनॉल मुख्यतः गन्ना, चावल और मक्का से बनता है — यही फसलें इंसानी भोजन और पशुचारे के लिए भी इस्तेमाल होती हैं। आलोचकों का कहना है कि अनाज को ईंधन की ओर मोड़ने से खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, ख़ासकर तब जब सस्ते चावल का हिस्सा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) से घटाकर एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा जा रहा हो।
4. पानी की भारी खपत
यह सबसे विवादित पहलू है। नीति आयोग और अलग-अलग शोधों के मुताबिक़ चावल से 1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 10,000+ लीटर पानी (सिंचाई सहित) लगता है, गन्ने से करीब 2,860-3,630 लीटर और मक्का से लगभग 4,670 लीटर। हालाँकि उद्योग संगठनों (जैसे GEMA) का तर्क है कि सिर्फ़ आसवनी (distillery) में प्रोसेसिंग के लिए केवल 3-5 लीटर पानी लगता है, और असली सवाल फ़सल की सिंचाई का है, न कि एथेनॉल बनाने की प्रक्रिया का — यह भारत के पहले से मौजूद जल-संकट को और गहरा कर सकता है, ख़ासकर उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में जहाँ भूजल पहले से ही चिंताजनक स्तर पर है।
5. नीतिगत टकराव
एक तरफ़ कृषि मंत्रालय "प्रति बूंद अधिक फ़सल" (More Crop Per Drop) जैसी जल-बचत नीतियाँ चला रहा है, तो दूसरी तरफ़ ईंधन नीति पानी-गहन फ़सलों को बढ़ावा दे रही है — विशेषज्ञ इसे नीतिगत विरोधाभास बताते हैं।
संतुलित निष्कर्ष
E20 को पूरी तरह अच्छा या पूरी तरह बुरा कहना ग़लत होगा — यह एक ट्रेड-ऑफ़ (व्यापार-संतुलन) है। ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा बचत और किसानों की आय के लिहाज़ से यह कार्यक्रम स्पष्ट लाभ देता है, और वैज्ञानिक अध्ययनों में अब तक बड़े पैमाने पर इंजन ख़राबी के प्रमाण नहीं मिले हैं। लेकिन माइलेज में मामूली गिरावट, पुरानी गाड़ियों की समस्याएं, और सबसे ज़्यादा — पानी व खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाला दबाव — ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि गन्ने के रस या द्वितीय-पीढ़ी (2G) के कृषि-अवशेषों जैसे कम पानी-गहन स्रोतों की ओर बढ़ना इस कार्यक्रम को अधिक टिकाऊ बना सकता है।
नोट: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी बयानों, मीडिया रिपोर्ट्स और शोध अध्ययनों पर आधारित है। संख्याएँ और आंकड़े स्रोत के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं, क्योंकि कई आंकड़े राजनीतिक रूप से विवादित भी हैं।