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महागठबंधन के लिए बुरी खबर नहीं है नीतीश का BJP के संग जाना

ई-कॉमर्स ने लोगों को अपने घर और ऑफिस में पुरानी और इस्तेमाल में न आने वाली चीजों को बेचने का विकल्प दिया. वहीं यदि घर या ऑफिस से ऐसे फालतू सामान खुद ब खुद गायब हो जाएं तो कितना अच्छा हो. राजनीति में नीतीश कुमार का महागठबंधन को छोड़ना कुछ ऐसा ही साबित हुआ और विपक्ष के खेमे से इस्तेमाल में नहीं आ रहा सामान अपने आप हट गया.

महागठबंधन की शुरुआत से ही यह मिथक रहा कि नीतीश कुमार विपक्ष के साथ हैं. इस विपक्ष में उनकी मौजूदगी महज बिहार में सरकार का नेतृत्व करने के लिए थी और इससे अधिक उसे कुछ नहीं हासिल हो रहा था. नीतीश मुख्यमंत्री पद पर बैठे रहे और महागठबंधन इसे मोदी के खिलाफ अपनी बड़ी जीत समझता रहा.

वहीं मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर या तो चुप रहे, नहीं तो बीजेपी और मोदी के विरोध में कम से कम शब्दों का इस्तेमाल कर आगे बढ़ते रहे. बीते साल जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार ने नोटबंदी का ऐलान किया तो पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर लामबंद होने लगा. लेकिन नीतीश कुमार ने मोदी सरकार के फैसले के पक्ष में आकर विपक्ष के लामबंदी की हवा निकाल दी. नतीजा ये रहा कि नोटबंदी जैसे अहम मुद्दे पर विपक्ष की पूरी लड़ाई में नीतीश कुमार का कोई रोल नहीं था.

यही नतीजा एक बार फिर देखने को मिला, जब सोनिया गांधी ने नए राष्ट्रपति के चयन के लिए पूरे विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश की. नीतीश न सिर्फ इस कवायद से दूर रहे बल्कि आगे बढ़कर विरोधी खेमे में रणनीति बनाने में लग गए. यह एक और मौका था जब विपक्ष को नीतीश से आस थी और उसे सिर्फ धोखा मिला.

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